मेट्टूर बांध (Mettur Dam) में पानी का लेवल गिरकर **46 TMC** तक आ गया है, जो ट्रिब्यूनल के आदेशों से **70 TMC** कम है। इस जल संकट से कावेरी डेल्टा में **40%** धान की खेती प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर ग्रामीण मांग और एग्री-इनपुट सेल्स पर पड़ना तय है।
मेट्टूर बांध इन दिनों गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। बांध का मौजूदा स्टॉक इसकी कुल क्षमता से आधे से भी कम रह गया है। पानी का इनफ्लो (Inflow) घटकर 2,281 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड के बेहद निचले स्तर पर आ गया है, जो अगले एक महीने की सिंचाई के लिए भी पर्याप्त नहीं है। यह स्थिति कावेरी डेल्टा की प्रमुख 'सांबा' धान की फसल के लिए बड़ा अनिश्चितता का माहौल पैदा कर रही है।
पानी का बंटवारा और संकट की जड़
यह संकट कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी के बंटवारे को लेकर पैदा हुए विवाद का नतीजा है। सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के आदेशों के अनुसार, 22 सितंबर तक कर्नाटक को 113.33 TMC पानी देना था, लेकिन अब तक केवल 43 TMC ही मिल पाया है, जिससे 70 TMC की भारी कमी बनी हुई है। कर्नाटक के अपने रिजर्व भी सिर्फ 37 TMC हैं, इसलिए फिलहाल पानी मिलने की उम्मीद काफी कम है।
इकोनॉमी पर असर
इस कृषि संकट का असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है। डेल्टा क्षेत्र धान उत्पादन का बड़ा केंद्र है, और उत्पादन घटने से किसानों की कमाई पर मार पड़ेगी। यदि किसान बुवाई नहीं कर पाते हैं, तो खाद, बीज और कृषि उपकरणों (Agri-inputs) की मांग में बड़ी गिरावट आ सकती है, जो इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों के लिए चिंता का विषय है।
सरकार से राहत की मांग
नेता और किसान संगठन अब सरकारी मदद की गुहार लगा रहे हैं। मुआवजे के रूप में प्रति एकड़ ₹25,000 की सहायता और फसल बचाने के लिए ₹10,000 प्रति एकड़ के इनपुट पैकेज की मांग की जा रही है। साथ ही, फरवरी 2027 तक तीन-फेज बिजली आपूर्ति की मांग भी तेज है ताकि किसान ग्राउंडवाटर का उपयोग कर सकें। आने वाले समय में सरकार के मुआवजे और चावल की कीमतों में उतार-चढ़ाव पर नजर रखना निवेशकों के लिए जरूरी होगा।
