केंद्रीय कैबिनेट ने देश में यूरिया उत्पादन क्षमता को बढ़ावा देने के लिए 'यूरिया इन्वेस्टमेंट पॉलिसी-2026' को हरी झंडी दे दी है। इसका लक्ष्य 10 मिलियन टन नई घरेलू उत्पादन क्षमता जोड़ना है, जिससे यूरिया की बढ़ती मांग और उत्पादन के बीच के अंतर को पाटा जा सके और आयात पर निर्भरता कम हो।
यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर भारत
सरकार ने 'यूरिया इन्वेस्टमेंट पॉलिसी-2026' को मंजूरी देकर भारत के फर्टिलाइजर (खाद्य) सेक्टर में एक बड़े बदलाव का ऐलान किया है। इस नई नीति का मुख्य उद्देश्य देश में प्राकृतिक गैस पर आधारित नए यूरिया प्लांट लगाना है, जिससे सालाना 10 मिलियन टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता तैयार हो सके। फिलहाल, भारत सालाना करीब 30 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन करता है, जबकि मांग 40 मिलियन टन के आसपास है। इस 10 मिलियन टन के फासले को पूरा करने के लिए सरकार आयात पर काफी निर्भर रहती है। नए प्लांट लगने से न केवल सप्लाई स्थिर होगी, बल्कि आयात पर होने वाले विदेशी मुद्रा खर्च में भी कमी आएगी। उम्मीद है कि इस नीति के तहत आठ से नौ नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाए जाएंगे।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह पॉलिसी निवेशकों को लुभाने के लिए कई अहम प्रावधान लेकर आई है। सरकार ने सब्सिडी की गणना के लिए फिक्स्ड और वेरिएबल कॉस्ट को अलग-अलग करने का फॉर्मूला तय किया है। सबसे खास बात यह है कि प्लांट ऑपरेटर्स के लिए 12% से 16% तक का तय रिटर्न (assured returns) सुनिश्चित किया गया है। इसके अलावा, उन कंपनियों के लिए भी खास इंतजाम किए गए हैं जो डॉलर में कीमत वाले नेचुरल गैस के आयात से जुड़े फॉरेन एक्सचेंज रिस्क (विदेशी मुद्रा जोखिम) को मैनेज करना चाहती हैं।
सेक्टर का पिछला रिकॉर्ड और आगे की राह
पिछले एक दशक में भारत ने डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए हैं, और इस दौरान छह नए प्लांट सफलतापूर्वक चालू भी हुए हैं। फर्टिलाइजर सेक्टर हमेशा से ही सरकारी सब्सिडी नीतियों, नेचुरल गैस की उपलब्धता और प्लांट के कुशल संचालन पर निर्भर रहा है। Coromandel International, Chambal Fertilisers and Chemicals, और Rashtriya Chemicals and Fertilizers जैसी कंपनियां इसी सब्सिडी-आधारित मॉडल पर काम करती हैं।
हालांकि तय रिटर्न से आय की विजिबिलिटी बढ़ी है, लेकिन कंपनियों को प्रोजेक्ट अप्रूवल, प्लांट निर्माण की समय-सीमा और एनर्जी एफिशिएंसी जैसे पहलुओं पर ध्यान देना होगा। चूंकि फर्टिलाइजर मैन्युफैक्चरिंग एक कैपिटल-इंटेंसिव (पूंजी-गहन) काम है, इसलिए कंपनियां इन नए प्रोजेक्ट्स को कैसे फंड करेंगी (लोन या अपनी जमा पूंजी से), यह उनके बैलेंस शीट और इंटरेस्ट कॉस्ट पर असर डालेगा। अब इंडस्ट्री को इस नई पॉलिसी के तहत प्रोजेक्ट प्रस्ताव जमा करने की समय-सीमा और विस्तृत कार्यान्वयन गाइडलाइंस का इंतजार है।
