खेती के जोखिम में आया बड़ा बदलाव
बुंदेलखंड के बारे में जब भी बात होती है, तो ज़हन में पानी की कमी और सूखे का ख्याल आता है। लेकिन अब कृषि उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खतरा बारिश या सिंचाई की कमी नहीं, बल्कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों का पूरी तरह तबाह हो जाना है। किसान अब इस बात का हिसाब नहीं लगाते कि कितनी बारिश होगी, बल्कि इस बात की चिंता करते हैं कि कहीं आज रात नीलगाय और जंगली सूअर उनकी सारी फसलें बर्बाद न कर दें। ऐसे में बीज, खाद और मेहनत पर किया गया सारा खर्च रातों-रात ज़ीरो हो जाता है। इन सबके चलते छोटे किसानों के लिए मुनाफे के पारंपरिक तरीके बेकार हो गए हैं।
बचाव के इंतजाम क्यों फेल हो रहे हैं?
नीलगाय और जंगली सूअर जैसे जानवरों की शारीरिक क्षमता और संख्या के आगे सोलर फेंसिंग जैसे बचाव के तरीके भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। भले ही कुछ गैर-सरकारी संस्थाएं फेंसिंग लगाने में मदद कर रही हैं, लेकिन उनकी बनावट स्थानीय जानवरों की कूदने की क्षमता और झुंड की तादाद को ध्यान में रखकर नहीं की गई है। नतीजतन, किसानों को या तो 24 घंटे पहरा देना पड़ता है या फिर बाड़ लगाने में इतना खर्च आता है कि वह फसल से होने वाली कमाई के बराबर हो जाता है। यह एक ऐसी स्थिति बन गई है जहाँ खेती जारी रखने से ज्यादा बेहतर जमीन छोड़ देना लगता है, खासकर उन फसलों के लिए जिन्हें एक स्थिर मौसम की जरूरत होती है।
भविष्य की चिंताएं और सरकारी नीतियां
यह समस्या छोटे किसानों के भविष्य पर गहरा सवालिया निशान लगा रही है। सिर्फ फसलें बर्बाद नहीं हो रही हैं, बल्कि गांव से लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जब घर के मुखिया शहर चले जाते हैं, तो पीछे ज्यादातर बुजुर्ग बचते हैं, जिनके लिए खेती संभालना या जानवरों से बचाव के इंतजाम करना मुश्किल होता है। इस जनसांख्यिकीय बदलाव का मतलब है कि आने वाले समय में खेती के लिए मज़दूर मिलना और भी मुश्किल हो जाएगा। अगर सरकार वन्यजीव गलियारों के प्रबंधन या मुआवज़े जैसी कोई ठोस व्यवस्था नहीं करती है, तो बुंदेलखंड में खेती का खत्म होना तय है।
आगे क्या और नीतियां कहाँ चूक रही हैं?
बाजार के जानकार और नीति विश्लेषक लगातार इस बात पर नज़र रख रहे हैं कि कैसे ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन एक बड़े आर्थिक संकट का संकेत दे रहा है। मौजूदा कृषि नीतियां अभी भी पानी पर ही केंद्रित हैं, जबकि हकीकत में नुकसान जंगली जानवरों की वजह से हो रहा है। यानी, सरकारी सहायता का ढांचा सही दिशा में नहीं है। भविष्य में स्थिरता लाने के लिए सिंचाई बढ़ाने से ज्यादा ज़रूरी है कि वन्यजीव संरक्षण की नीतियों को किसानों की जीविका चलाने की क्षमता के साथ जोड़ा जाए, ताकि मध्य भारत में खेती का एक मजबूत आधार बना रहे।
