बिहार की 'जैविक कॉरिडोर' योजना ने 20,000 से ज्यादा किसानों को जैविक खेती से जोड़ा है, लेकिन उन्हें ऊंचे दाम दिलाने वाले खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। सरकारी मदद के बावजूद, किसानों को बाजार तक पहुंच की कमी खल रही है, जिससे वे अपनी उपज का बेहतर दाम नहीं ले पा रहे हैं। अब इस समस्या को हल करने के लिए सीधे ग्राहकों तक पहुंचने वाले मॉडल जैसे 'हाट' (साप्ताहिक बाजार) पर विचार किया जा रहा है।
'जैविक कॉरिडोर' की कहानी
बिहार में गंगा नदी के किनारे जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की एक बड़ी पहल 'जैविक कॉरिडोर' (Jaivik Corridor) शुरू की गई है। 2020 से 2025 तक चलने वाली इस योजना ने 13 जिलों के 20,000 से अधिक किसानों को प्रमाणित जैविक खेती से जोड़ा है। सरकार किसानों को प्रति एकड़ ₹24,500 की सब्सिडी भी दे रही है, जो किस्तों में दी जाती है। लेकिन, एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनी हुई है: किसान अपनी जैविक उपज के लिए अच्छा दाम नहीं ले पा रहे हैं।
प्रीमियम दाम की मुश्किल
जैविक खेती को फायदेमंद बनाने के लिए, किसानों को अपनी उपज का दाम सामान्य फसलों से ज़्यादा मिलना चाहिए। यह 'प्रीमियम' दाम जैविक खाद और सर्टिफिकेशन के ज़्यादा खर्च को कवर करता है। लेकिन, मौजूदा व्यवस्था में किसान अपनी उपज अक्सर पारंपरिक तरीकों से बेच देते हैं, जहाँ केमिकल-फ्री क्वालिटी को खास महत्व नहीं मिलता। इस वजह से, मेहनत के बावजूद किसान को कमाई सीमित रह जाती है। शहरी ग्राहकों तक पहुँचने का कोई सीधा रास्ता न होने पर, जैविक खेती बनाए रखने का आर्थिक प्रोत्साहन कमज़ोर पड़ सकता है।
समाधान की राह: सहकारी मॉडल?
विशेषज्ञ और नीति निर्माता 'गोरखा हाट' (Gorkha Haat) जैसे सफल मॉडलों पर गौर कर रहे हैं। मूल रूप से कलिम्पोंग से आया यह मॉडल, एक सहकारी व्यवस्था का उपयोग करता है जहाँ स्थानीय उपज खास, किसानों द्वारा चलाए जाने वाले बाज़ारों में बेची जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बाज़ारों में जोखिम-साझाकरण (risk-sharing) का भी इंतज़ाम है, जो सदस्यों को स्वास्थ्य या शिक्षा जैसे अचानक आने वाले खर्चों में मदद करता है। बिहार में पहले से ही जीविका (Jeevika), राज्य के ग्रामीण आजीविका मिशन, के माध्यम से ऐसी संस्थाओं की मजबूत नींव है। जीविका ने लाखों परिवारों को स्वयं सहायता समूहों और क्लस्टर-स्तरीय महासंघों में संगठित किया है। इस मौजूदा नेटवर्क को एक नई, समय-समय पर लगने वाली बाज़ार प्रणाली के साथ जोड़ने से ग्रामीण आपूर्ति और शहरी मांग के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।
ग्राहकों से जुड़ाव का महत्व
सिर्फ बाज़ार स्थापित करने से आगे बढ़कर, 'कहानी कहने' (storytelling) के ज़रिए मांग बनाने की ज़रूरत को भी समझा जा रहा है। हाल ही में पटना में हुए हिमालयन ऑरेंज फेस्टिवल (Himalayan Orange Festival) ने इसे साफ दिखाया। जब किसानों ने सीधे ग्राहकों से अपने पहाड़ी बागानों, मेहनत और खेती के तरीकों की कहानियाँ साझा कीं, तो खरीदारों ने प्रीमियम दाम देने में ज़्यादा रुचि दिखाई। इससे पता चलता है कि सिर्फ एक बाज़ार काफी नहीं है; जैविक सामानों की ऊंची कीमतों को सही ठहराने के लिए एक सक्रिय, कहानी-आधारित दृष्टिकोण ज़रूरी है।
जोखिम और आगे की राह
कुछ ढांचागत जोखिम (structural risks) परियोजना की सफलता को प्रभावित कर रहे हैं। NPOP-प्रमाणित जैविक उर्वरकों की उच्च लागत कभी-कभी सरकारी अनुदान से मिलने वाले लाभ से ज़्यादा हो जाती है। इसके अलावा, पर्याप्त कोल्ड चेन और भंडारण सुविधाओं की कमी का मतलब है कि उपज को अक्सर जल्दी बेचना पड़ता है, जिससे किसान की मोलभाव करने की शक्ति सीमित हो जाती है। निवेशक और कृषि हितधारक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि क्या कृषि विभाग और जीविका नेटवर्क पटना, भागलपुर और वैशाली जैसे शहरों में पायलट 'हाट' सफलतापूर्वक लॉन्च करते हैं। अगली महत्वपूर्ण जानकारी इन शहरी-केंद्रित बाज़ार लिंकेज का विकास होगी, जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि जैविक खेती राज्य के किसानों के लिए एक टिकाऊ और लाभदायक आजीविका बनी रहे।
