बिहार में किसानों की बल्ले-बल्ले! केंद्र सरकार की MSP खरीद से मसूर को मिला ₹7,000 का भाव

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AuthorNeha Patil|Published at:
बिहार में किसानों की बल्ले-बल्ले! केंद्र सरकार की MSP खरीद से मसूर को मिला ₹7,000 का भाव

बिहार सरकार ने मसूर की सीधी खरीद शुरू कर दी है, जिससे किसानों को अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) **₹7,000** प्रति क्विंटल का सीधा लाभ मिलेगा। यह बड़ा कदम राज्य के कृषि क्षेत्र में एक नया बदलाव लाएगा, जहां करीब दो दशकों से किसानों को MSP का सीधा एक्सेस नहीं था।

बिहार ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर सीधे मसूर की खरीद शुरू कर दी है। यह राज्य के किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है, क्योंकि लगभग 20 सालों बाद उन्हें अपनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सीधे मिल पाएगा। इससे पहले, राज्य में स्थानीय बिचौलिए ही किसानों से औने-पौने दाम पर फसल खरीदते थे।

कौन कर रहा है खरीद?

यह नई खरीद प्रक्रिया नेशनल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) और नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (Nafed) जैसी केंद्रीय संस्थाएं संभाल रही हैं। इनके ज़रिए, मसूर (lentils) सीधे किसानों से खरीदी जाएगी और भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में आएगा। आपको बता दें कि 2006 में बिहार में राज्य स्तरीय एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) सिस्टम खत्म कर दिया गया था, जिसके बाद से किसान निजी व्यापारियों पर निर्भर थे, जो अक्सर सरकारी रेट से कम दाम देते थे।

अब तक कितनी हुई खरीद?

मिड-अगस्त 2026 तक, इस पहल ने रफ्तार पकड़ ली है। करीब 3,000 टन मसूर की खरीद राज्य के कई जिलों जैसे पटना, नालंदा और रोहतास से की जा चुकी है। सरकार का लक्ष्य राज्य से कुल 32,000 टन मसूर खरीदने का है। अब तक लगभग 750 किसानों को इसका फायदा मिला है, जिन्हें MSP ₹7,000 प्रति क्विंटल के हिसाब से करीब ₹21 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। यह कदम 'मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस' के तहत उठाया गया है, जिसका मकसद देश में दालों का उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है।

बिजनेस पर क्या होगा असर?

यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी अहमियत रखती है। खरीद प्रक्रिया को व्यवस्थित करने और किसानों को बेहतर दाम दिलाने से बिहार के दाल उत्पादक परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम बढ़ सकती है। बिहार सालाना लगभग 4 लाख टन दालों का उत्पादन करता है। ऐसे में, ग्रामीण उपभोक्ता क्षेत्र, एग्री इनपुट्स (जैसे खाद और बीज) बनाने वाली कंपनियां, और वेयरहाउसिंग फर्मों पर नजर रख सकती हैं। सरकारी खरीद में निरंतरता से ग्रामीण मांग में सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर के बेहतर इस्तेमाल की उम्मीद है।

आगे की चुनौतियां

हालांकि, इस योजना को सफल बनाने के लिए कुछ परिचालन संबंधी बाधाएं भी हैं। खरीद को मौजूदा 3,000 टन से बढ़ाकर 32,000 टन के लक्ष्य तक ले जाने के लिए बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट एंड रेगुलेटरी अथॉरिटी द्वारा अनुमोदित वैज्ञानिक भंडारण सुविधाओं की आवश्यकता होगी। अतीत में भी ऐसी सरकारी खरीद योजनाओं में भुगतान में देरी और बड़े पैमाने पर खरीद के प्रशासनिक समन्वय जैसी चुनौतियां देखी गई हैं। NCCF और Nafed को खरीद की गति बनाए रखने और आने वाले फसल सीजन के लिए लॉजिस्टिक्स की मांगों को पूरा करने के लिए अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार रखना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.