नीलगाय और जंगली सूअरों का आतंक: बिहार के किसान छोड़ रहे हैं महंगी फसलें, गेहूं-धान की ओर बढ़े

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AuthorNeha Patil|Published at:
नीलगाय और जंगली सूअरों का आतंक: बिहार के किसान छोड़ रहे हैं महंगी फसलें, गेहूं-धान की ओर बढ़े

बिहार के किसान इन दिनों एक बड़ी मुसीबत से जूझ रहे हैं। नीलगाय (Nilgai) और जंगली सूअरों (Wild Boars) के फसलों को तबाह करने के कारण, वे मक्का (Maize) और दालों (Pulses) जैसी महंगी फसलें छोड़कर गेहूं (Wheat) और धान (Paddy) जैसी कम मुनाफा देने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। इस बदलाव से न सिर्फ ग्रामीण आय प्रभावित हो रही है, बल्कि स्थानीय सप्लाई चेन (Supply Chain) पर भी असर पड़ रहा है। सरकारी मदद में देरी और विभागों के बीच तालमेल की कमी इस समस्या को और बढ़ा रही है।

क्या है मामला?

बिहार के मैदानी इलाकों में खेती इन दिनों वन्यजीवों के हमलों का सामना कर रही है। नीलगाय और जंगली सूअर फसलों के लिए एक बड़ा खतरा बन गए हैं। पिछले एक दशक से यह समस्या मौसम की मार से बढ़कर एक स्थायी चुनौती बन गई है, जिसके चलते कई किसान महंगी व्यावसायिक फसलों की खेती छोड़ रहे हैं। किसान अब मक्का, दालों और सब्जियों जैसी मुनाफे वाली फसलों की बजाय गेहूं और धान की खेती पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। ये फसलें जानवरों को कम आकर्षित करती हैं, लेकिन इनसे कमाई भी कम होती है, जिससे किसानों की आय पर भारी दबाव पड़ रहा है।

किसानों पर आर्थिक बोझ

महंगी फसलों को छोड़ने से छोटे किसानों पर आर्थिक संकट गहरा रहा है। जब किसान मक्का और दालों की खेती कम करते हैं, तो वे उन उत्पादों से हाथ धो बैठते हैं जिनसे उन्हें बेहतर मुनाफा मिलता था। इस कमी के कारण किसानों को अपनी लागत निकालने के लिए कर्ज पर ज़्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है, क्योंकि गेहूं और धान से होने वाली कमाई, छोड़ी गई महंगी फसलों के मुनाफे की भरपाई नहीं कर पाती। फसल बीमा योजनाएं होने के बावजूद, कई किसान मानते हैं कि मुआवज़े की प्रक्रिया जटिल है या फिर नुकसान की पूरी भरपाई करने में नाकाफी है, जिससे उन्हें सीमित वित्तीय सुरक्षा मिल पाती है।

क्षेत्रीय फसल उत्पादन पर असर

बिहार कृषि विभाग की रिपोर्टों (2019-20 से 2023-24) से इस बदलाव का अंदाज़ा लगता है। प्रमुख जिलों में पारंपरिक फसलों के उत्पादन में साफ गिरावट दर्ज की गई है। उदाहरण के लिए, कैमूर (Kaimur) और रोहतास (Rohtas) जैसे जिलों में जौ (Barley) का उत्पादन काफी कम हुआ है, जबकि कई इलाकों से ज्वार (Jowar) की खेती लगभग गायब हो गई है। पूर्वी बिहार की एक महत्वपूर्ण फसल मक्का का रकबा भी कम हो रहा है, क्योंकि किसान कटाई के समय फसल के पूरी तरह तबाह होने का जोखिम कम करना चाहते हैं।

नीतियों और विभागों में तालमेल का अभाव

इस संकट को हल करने में सबसे बड़ी बाधा एक एकीकृत सरकारी नीति की कमी है। कृषि विभाग और वन विभाग के बीच इस बात को लेकर लगातार भ्रम की स्थिति बनी रहती है कि वन्यजीवों से निपटने की ज़िम्मेदारी किसकी है। कृषि विभाग अक्सर किसानों को वन विभाग की ओर भेजता है, जबकि वन विभाग जानवरों को उस श्रेणी में नहीं रखता जिससे सीधे हस्तक्षेप की अनुमति मिल सके। इस नौकरशाही के जाल में किसान राहत के स्पष्ट रास्ते से वंचित हैं। कभी-कभार गोली चलाने जैसे उपायों से सिर्फ़ थोड़े समय के लिए और स्थानीय स्तर पर ही राहत मिलती है, कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता।

आगे क्या देखना ज़रूरी?

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र पर नज़र रखने वालों के लिए, नीतिगत बदलावों और सप्लाई (Supply) के रुझानों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, राज्य सरकार से ऐसे किसी भी नीतिगत अपडेट पर नज़र रखें जो वन और कृषि विभागों के बीच समन्वय को संबोधित करता हो, क्योंकि यह किसी भी दीर्घकालिक समाधान के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरे, क्षेत्रीय कमोडिटी (Commodity) उत्पादन के आंकड़ों पर नज़र रखें, क्योंकि बिहार क्षेत्र से दालों और मक्का के उत्पादन में लगातार गिरावट स्थानीय खरीद और कीमतों को प्रभावित कर सकती है। अंत में, इन जिलों में ग्रामीण ऋणदाताओं के प्रदर्शन का अवलोकन करें, क्योंकि फसल आय में कमी अक्सर छोटे कृषि ऋणों पर दबाव बढ़ने से जुड़ी होती है।

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