संकट में बासमती एक्सपोर्ट! शिपिंग खर्च पहुंचा **70%** तक, निर्यातक परेशान

AGRICULTURE
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AuthorAditya Rao|Published at:
संकट में बासमती एक्सपोर्ट! शिपिंग खर्च पहुंचा **70%** तक, निर्यातक परेशान
Overview

भारत के बासमती चावल एक्सपोर्टर्स (Basmati rice exporters) इस वक्त एक बड़ी मुश्किल में फंसे हुए हैं. वे सरकारी दखल की मांग कर रहे हैं क्योंकि शिपिंग के मनमाने चार्जेज (shipping charges) से उनका बिजनेस ठप पड़ रहा है. वॉर-रिस्क सरचार्ज (war-risk surcharges) इतना बढ़ गया है कि यह कार्गो (cargo) की कीमत का **70%** तक पहुंच गया है, जिससे एक्सपोर्ट्स की राह मुश्किल हो गई है.

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एक्सपोर्टर्स के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती

Basmati Rice Farmers & Exporters Development Forum (BRFED) ने सरकार से शिपिंग चार्जेज को लेकर सख्त कदम उठाने की अपील की है. फोरम ने इन शुल्कों को 'मनमाना और अपारदर्शी' बताया है. पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे संकट ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है, जिससे कई एक्सपोर्ट्स घाटे का सौदा साबित हो रहे हैं.

फोरम की चेयरपर्सन प्रियंका मित्तल (Priyanka Mittal) ने बताया कि वॉर-रिस्क सरचार्ज में भारी बढ़ोतरी हुई है. यह शुल्क पहले जहां $800 प्रति कंटेनर था, वहीं अब बढ़कर $6,000 तक पहुंच गया है. अचानक लगाए गए इन शुल्कों की वजह से यह अब कार्गो की कुल वैल्यू का 60% से 70% तक हो गया है.

मित्तल ने जोर देकर कहा, 'एक्सपोर्टर्स से ऐसी स्थिति के लिए असीमित वित्तीय जोखिम (financial risks) उठाने को कहा जा रहा है, जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है.'

लॉजिस्टिक्स का बढ़ता बोझ

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) के कारण शिपिंग लाइन्स कार्गो को जेबेल अली (Jebel Ali), सोहर (Sohar) और सलालह (Salalah) जैसे पोर्ट्स पर डायवर्ट कर रही हैं. कंटेनरों को ट्रांसफर हब पर बिना किसी स्पष्ट आगे की यात्रा योजना के रोका जा रहा है, और कभी-कभी तो उन्हें वापस शुरुआती पोर्ट पर भी भेजा जा रहा है. एक्सपोर्टर्स का कहना है कि उन्हें इन सभी moves की पूरी लागत चुकानी पड़ रही है, जो उनकी सहमति के बिना किए जा रहे हैं.

एक्सपोर्टर्स की मांगें

BRFED ने कुछ खास मांगें रखी हैं:

  • शिपिंग शुल्क (shipping fees) केवल की गई वास्तविक सेवाओं के लिए ही होने चाहिए.
  • शिपिंग कंपनियों को विवादित भुगतानों (disputed payments) के कारण कंटेनरों को रोके बिना रिलीज़ करना चाहिए.
  • भू-राजनीतिक अशांति (geopolitical unrest) के दौरान कार्गो को संभालने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए.

भारत के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (Directorate General of Shipping) ने शिकायतों पर संज्ञान लिया है और उन्हें एक अंतर-मंत्रालयी समूह (inter-ministerial group) को भेज दिया है, लेकिन जमीनी हकीकत में अब तक कोई सुधार नहीं हुआ है.

छोटे व्यवसायों पर सबसे ज्यादा मार

इस संकट का सबसे ज्यादा असर छोटे एक्सपोर्टर्स पर पड़ रहा है. फोरम ने बड़ी ग्लोबल शिपिंग कंपनियों और छोटे व्यापारियों के बीच मोलभाव की ताकत (bargaining power) में भारी अंतर की ओर इशारा किया. इस वजह से कई छोटे व्यवसायों के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं, और कुछ तो चार्जेज बढ़ते देख अपना कार्गो छोड़ने पर भी विचार कर रहे हैं. चेयरपर्सन मित्तल ने चेतावनी दी कि इन मुद्दों को हल न करने से भारत की व्यापार प्रणाली (trade system) पर भरोसा कम हो सकता है.

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.