BioAgri Input Producers Association (BIPA) ने भारत में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड के उपयोग को **25%** कम करने का प्रस्ताव रखा है। इस कदम का मकसद सरकार के **₹1.75 लाख करोड़** के सब्सिडी बोझ को कम करना और मिट्टी की सेहत को सुधारना है।
BIPA ने देश भर में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से 25% घटाने का औपचारिक प्रस्ताव रखा है। इस पहल का लक्ष्य पारंपरिक खेती के मॉडल को बदलकर 'बायोलॉजिकल इनपुट्स' को अपनाना है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार हो सके। यह प्रस्ताव हैदराबाद में 7-8 अक्टूबर को होने वाले BIOAGRI 2026 समिट में चर्चा का मुख्य विषय होगा।
सरकारी खजाने को बड़ी राहत
भारत सालाना करीब 35 मिलियन टन यूरिया का उपभोग करता है, जिससे सरकार पर ₹1.75 लाख करोड़ से अधिक का सब्सिडी बिल आता है। BIPA का अनुमान है कि अगर बायो-फर्टिलाइजर्स और बायो-स्टिमुलेंट्स की ओर शिफ्ट किया जाए, तो सरकारी खजाने से हर साल ₹40,000 करोड़ की भारी बचत की जा सकती है। इससे न केवल सब्सिडी का बोझ कम होगा, बल्कि डायमोनियम फॉस्फेट (DAP) और पोटाश के भारी आयात से होने वाली विदेशी मुद्रा की निकासी पर भी लगाम लगेगी।
क्या यह रसायनों का अंत है?
एक्सपर्ट्स साफ कर रहे हैं कि यह रसायनों को तुरंत हटाने की योजना नहीं है, बल्कि एक 'इंटीग्रेटेड अप्रोच' है। लक्ष्य फसल की पैदावार बनाए रखते हुए खेती के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। मिट्टी की बिगड़ती सेहत कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ा रिस्क है, जिसे यह मॉडल बैलेंस करने की कोशिश करेगा।
निवेशकों के लिए संकेत
एग्री-इनपुट सेक्टर के लिए यह एक बड़े बदलाव का संकेत है। जो कंपनियां बायो-स्टिमुलेंट्स और ऑर्गेनिक समाधानों की ओर शिफ्ट हो रही हैं, उनके लिए बाजार में नए मौके बन सकते हैं। हालांकि, ट्रांजिशन के दौरान रिस्क भी है—जैसे किसानों द्वारा इसे अपनाने की रफ्तार और फसल की पैदावार की स्थिरता। निवेशकों को अब सरकारी नीति और अक्टूबर समिट से आने वाले संकेतों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यूरिया और DAP की वॉल्यूम ग्रोथ पर असर पड़ने से पारंपरिक फर्टिलाइजर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
