अरहर की बुवाई में 18% की गिरावट, कर्नाटक के सूखे का असर

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AuthorAditya Rao|Published at:
अरहर की बुवाई में 18% की गिरावट, कर्नाटक के सूखे का असर

देश में अरहर (तुअर दाल) की बुवाई में **17%** की गिरावट दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण कर्नाटक और मध्य प्रदेश में सूखे की स्थिति है। इस कमी के चलते सरकार का **50 लाख हेक्टेयर** का बुवाई लक्ष्य खतरे में पड़ सकता है, जो घरेलू सप्लाई और कीमतों को प्रभावित कर सकता है।

Detailed Coverage

बुवाई का टारगेट खतरे में?

भारत की दालों की सप्लाई के लिए अहम अरहर की खरीफ बुवाई के मौसम में बड़ी चुनौतियां आ रही हैं। 17 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार, अरहर का रकबा 24.80 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया है, जो इस अवधि में सामान्य प्रगति की तुलना में 18% कम है। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि सरकार ने 50 लाख हेक्टेयर का कुल बुवाई क्षेत्र हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जिससे 40 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य पूरा हो सके।

राज्यों में बुवाई का हाल

अरहर की बुवाई में आई यह कमी मुख्य रूप से कर्नाटक में देखी जा रही है, जहां बुवाई 42% घटकर 6.56 लाख हेक्टेयर रह गई है। मध्य प्रदेश में भी स्थिति खराब है, बुवाई 31% गिरकर 1.34 लाख हेक्टेयर हो गई है। हालांकि, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना के किसानों ने अपनी बुवाई 30% और 16% बढ़ाई है, लेकिन इन राज्यों की बढ़ोतरी प्रमुख उत्पादक राज्यों में आई भारी गिरावट की भरपाई करने के लिए काफी नहीं है। आंध्र प्रदेश में बुवाई दोगुनी से भी ज्यादा होकर 1.08 लाख हेक्टेयर हो गई है, लेकिन यह प्रमुख क्षेत्रों की तुलना में अभी भी कम है।

बारिश का पैटर्न और उत्पादन पर जोखिम

बारिश की अनियमितता बुवाई में इस कमी का सबसे बड़ा कारण है। कर्नाटक में कुछ किसानों को शुरुआती सूखे के कारण फसल दोबारा बोनी पड़ी है, जिससे लागत बढ़ी है और कटाई का चक्र जटिल हो गया है। महाराष्ट्र और गुजरात में भी बुवाई के आंकड़े कम हैं, जो इस साल के कुल उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। अगर कुल बुवाई का रकबा 50 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता है, तो इससे घरेलू सप्लाई पर दबाव बन सकता है और दालों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अरहर की बुवाई का समय किसानों द्वारा चुनी गई किस्म के आधार पर आमतौर पर 10 अगस्त तक रहता है। जैसे-जैसे मानसून के मौसम में देरी और अप्रत्याशितता बढ़ रही है, छोटी अवधि वाली किस्मों की ओर रुझान बढ़ रहा है। भविष्य में सप्लाई का स्तर अगले कुछ हफ्तों में बारिश की तीव्रता और वितरण पर बहुत अधिक निर्भर करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.