Association of Natural Rubber Producing Countries (ANRPC) ने 2030 के लिए एक नई रणनीति का ऐलान किया है। इसका मकसद सप्लाई चेन में पारदर्शिता लाना और EU के कड़े पर्यावरणीय नियमों का पालन करना है। भारत का **₹1,100 करोड़** का INROAD प्रोजेक्ट इस दिशा में एक बड़ी पहल है, जो उत्पादन बढ़ाने और छोटे किसानों को सहारा देने पर केंद्रित है।
ग्लोबल रबर मार्केट में बदलाव की आहट
कोच्चि में आयोजित 'सस्टेनेबल नेचुरल रबर फोरम' में ANRPC ने अपनी नई 2030 रणनीति पेश की है। इसका मुख्य जोर डिजिटल ट्रेसिबिलिटी पर है। यह कदम 'यूरोपीय संघ के डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन' (EUDR) के दबाव के बीच उठाया गया है, जिसके तहत रबर उत्पादकों को यह साबित करना होगा कि उनका रबर जंगलों की कटाई से नहीं आया है। ऐसा न करने पर यूरोपीय बाजार के दरवाजे बंद हो सकते हैं।
भारत का INROAD प्रोजेक्ट: गेम चेंजर?
भारत का ₹1,100 करोड़ का INROAD प्रोजेक्ट रबर बोर्ड और प्रमुख टायर कंपनियों जैसे Apollo Tyres, CEAT, JK Tyre, और MRF की एक जॉइंट कोशिश है। इसका लक्ष्य पूर्वोत्तर भारत और पश्चिम बंगाल में रबर की खेती का विस्तार करना है। अब तक 1.8 लाख हेक्टेयर में नई प्लांटेशन की जा चुकी है, जबकि लक्ष्य 2 लाख हेक्टेयर का है। इससे भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी।
डिजिटल तकनीक का सहारा
compliance (अनुपालन) की लागत को कम करने के लिए, भारत में 'Bharat Sustainable Natural Rubber' (BSNR) प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है। यह एक डिजिटल लेजर है जो खेतों से लेकर फैक्ट्री तक रबर के सोर्स को वेरीफाई करता है।
रिस्क फैक्टर्स और चुनौती
हालांकि यह रोडमैप भविष्य के लिए सकारात्मक है, लेकिन रबर सेक्टर को कुछ बड़े रिस्क का सामना भी करना पड़ रहा है:
- क्लाइमेट चेंज: एल निनो (El Niño) जैसे वेदर पैटर्न का असर फसल की पैदावार पर पड़ता है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहता है।
- सिंथेटिक रबर से मुकाबला: सिंथेटिक रबर की कीमतें कच्चे तेल (Crude Oil) से जुड़ी हैं, इसलिए तेल सस्ता होने पर टायर निर्माता नेचुरल रबर की जगह सिंथेटिक की ओर शिफ्ट हो सकते हैं।
- लागत: लाखों छोटे किसानों तक इन नई तकनीकी मानकों को लागू करना अभी भी एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनी हुई है।
