साल 2026 का साउथवेस्ट मानसून सीजन **13%** की कमी के साथ समाप्त हुआ है। देश के **313** जिलों में बारिश का बड़ा गैप देखने को मिला है, जिसका सीधा असर अब रूरल डिमांड, FMCG और एग्री-इनपुट सेक्टर पर पड़ सकता है।
भारत में साउथवेस्ट मानसून सीजन आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है, जिसमें बारिश का आंकड़ा लॉन्ग-पीरियड एवरेज का केवल 87% रहा है। इसका मतलब है कि देश को कुल 13% की बारिश की कमी का सामना करना पड़ा है। कृषि क्षेत्र के लिए मानसून पानी का मुख्य स्रोत है, ऐसे में असमान बारिश ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
आंकड़ों में समझें मानसून का हाल
इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के डेटा के मुताबिक, देश के 741 जिलों में से 313 जिलों में सामान्य से 20% कम बारिश दर्ज की गई है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सबसे ज्यादा 26% की कमी देखी गई है, जबकि दक्षिणी राज्यों में 24% बारिश कम हुई है। वहीं, मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में स्थिति थोड़ी बेहतर रही, जहां क्रमश: 3% और 6% की कमी दर्ज की गई है।
इन सेक्टरों पर होगी निवेशकों की नजर
मानसून की कमी का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सेक्टरों पर दिखना तय है:
- FMCG सेक्टर: मानसून और ग्रामीण खर्च का गहरा नाता होता है। कम बारिश से किसानों की आय पर दबाव पड़ता है, जिससे ग्रामीण इलाकों में पैक्ड गुड्स की मांग कम हो सकती है।
- एग्री-इनपुट (फर्टिलाइजर और बीज): कम बारिश के कारण बुआई प्रभावित होने का डर रहता है, जिससे फर्टिलाइजर और बीजों की मांग में गिरावट आ सकती है। जिन कंपनियों का एक्सपोजर पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में ज्यादा है, उन्हें इन्वेंट्री और डिमांड की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
महंगाई और RBI का रुख
मैक्रो लेवल पर, असमान बारिश का असर खरीफ की फसल पर पड़ता है, जिससे फूड इन्फ्लेशन बढ़ने का खतरा रहता है। यदि सप्लाई चेन में बाधा आती है और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ब्याज दरों से जुड़ी फैसलों पर भी पड़ सकता है।
अब बाजार की नजरें रबी सीजन की बुआई पर हैं। आने वाले हफ्तों में मिट्टी की नमी और जलाशयों में पानी का स्तर यह तय करेगा कि कृषि क्षेत्र इस कमी की भरपाई कैसे करता है।
