भूख और बर्बादी का कड़वा सच: 318 मिलियन लोग भूखे, जबकि 1.05 अरब टन खाना रोज़ाना बर्बाद!

AGRICULTURE
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AuthorNeha Patil|Published at:
भूख और बर्बादी का कड़वा सच: 318 मिलियन लोग भूखे, जबकि 1.05 अरब टन खाना रोज़ाना बर्बाद!
Overview

एक तरफ जहाँ दुनिया भर में **318 मिलियन** लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हर साल **1.05 अरब टन** से ज़्यादा खाना बर्बाद हो जाता है। यह चौंकाने वाला विरोधाभास खाद्य प्रबंधन (food management) में गहरी समस्याओं को उजागर करता है, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emissions) का भी एक बड़ा कारण है। भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में **102वें** स्थान पर है।

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भुखमरी और प्रचुरता का विरोधाभास

दुनिया भर में इतना खाना पैदा होता है कि हर किसी का पेट भर सके, लेकिन हकीकत यह है कि हर रोज़ 318 मिलियन लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। इस गंभीर स्थिति को बढ़ा रही है भारी मात्रा में होने वाली खाद्य बर्बादी। साल 2022 में अकेले 1.05 अरब टन खाना फेंक दिया गया। यह बर्बादी न सिर्फ ज़रूरी पोषण की कमी है, बल्कि यह ग्लोबल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 10% हिस्सा भी है, जो जलवायु परिवर्तन (climate change) की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

भारत की खाद्य सुरक्षा की लड़ाई

भारत की खाद्य सुरक्षा (food security) की स्थिति भी चिंताजनक है। 123 देशों की सूची में भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में 102वें स्थान पर है, जिसे 'गंभीर' खाद्य असुरक्षा (food insecurity) का दर्जा दिया गया है, जिसका स्कोर 25.8 है। हालाँकि भारत में घरों के स्तर पर खाने की बर्बादी दुनिया के औसत से कम है, लेकिन उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही भारी मात्रा में खाना खराब हो जाता है। पंजाब जैसे प्रमुख खेती वाले राज्यों में अत्यधिक मौसम (extreme weather) और कटाई के बाद भंडारण (post-harvest storage) की खराब सुविधाओं के कारण बहुत सारा अनाज ज़रूरतमंदों तक पहुँच ही नहीं पाता।

खाद्य बर्बादी से निपटना

इस जटिल संकट से निपटने के लिए केंद्रित कदमों की ज़रूरत है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक राष्ट्रीय कोल्ड-चेन सिस्टम (cold-chain system) स्थापित किया जाए। यूरोपीय देशों की तरह मज़बूत खाद्य दान (food donation) कार्यक्रमों को लागू करने से बचा हुआ खाना ज़रूरतमंदों तक पहुँचाया जा सकता है। किसानों को कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टेक्नोलॉजी देना और खाद्य बर्बादी को ट्रैक (track) करना अनिवार्य करना भी महत्वपूर्ण कदम हैं। अंततः, एक ऐसी सांस्कृतिक बदलाव (cultural change) की ज़रूरत है जहाँ अधिकता को स्टेटस सिंबल (status symbol) न समझा जाए, बल्कि भोजन संरक्षण (food conservation) को एक नागरिक कर्तव्य (civic duty) के रूप में देखा जाए।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.