US Navy ने अपनी प्रोक्योरमेंट स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव किया है। अब नेवी पुराने और लंबे समय तक चलने वाले डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स के बजाय कमर्शियल स्टार्टअप्स की तैयार टेक्नोलॉजी पर दांव लगाएगी, ताकि काम में तेजी आ सके।
नेवी की नई रणनीति: कस्टम नहीं, कमर्शियल प्रोडक्ट्स पर जोर
US Department of the Navy ने टेक्नोलॉजी एडॉप्शन को रफ्तार देने के लिए एक नया 'प्रोक्योरमेंट रोडमैप' तैयार किया है। इसके तहत नेवी अब ट्रेडिशनल डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स से हटकर Commercial-off-the-shelf (COTS) समाधानों को प्राथमिकता दे रही है। नेवी के CTO जस्टिन फनेली के नेतृत्व में, अब एजेंसी सीधे उन कंपनियों से तैयार या लगभग तैयार उत्पाद खरीदेगी, जो प्राइवेट सेक्टर में पहले से मौजूद हैं। इससे रिसर्च में लगने वाले वर्षों के समय की बचत होगी।
किन कंपनियों को होगा फायदा?
यह बदलाव उन स्टार्टअप्स के लिए गेम-चेंजर है जो Series D से Series F फंडिंग स्टेज में हैं। नेवी का लक्ष्य जोखिम कम करना है, इसलिए वे उन फर्मों के साथ काम करना चाहते हैं जिनकी तकनीक पहले से साबित हो चुकी है। हाल के दिनों में नेवी ने Applied Intuition के कैमरा सिस्टम, Gecko Robotics के इंस्पेक्शन टूल्स और Domino Data Lab के डेटा पाइपलाइन्स जैसे टूल्स का उपयोग शुरू भी कर दिया है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है संकेत?
नेवी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम इंफॉर्मेशन साइंस और एडवांस्ड नेटवर्किंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस कर रही है। नेवी का यह रुख साफ है कि वे अब बंद सिस्टम के बजाय कमर्शियल टेक इकोसिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं।
हालांकि, इसके साथ ही अर्ली-स्टेज स्टार्टअप्स के लिए चुनौती बढ़ सकती है। अगर सरकार खुद रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में पैसा नहीं लगाएगी, तो शुरुआती कंपनियों को खुद प्राइवेट मार्केट से फंड जुटाकर अपनी उपयोगिता साबित करनी होगी। डिफेंस सेक्टर में हो रहे इस ग्लोबल शिफ्ट पर निवेशकों की नजर है कि कौन से स्टार्टअप्स इस नई मांग के साथ खुद को जल्दी ढाल पाते हैं।
