US एयरफोर्स के पूर्व इंटेलिजेंस ऑफिसर David Grusch ने दावा किया है कि भारत के 2019 के 'मिशन शक्ति' एंटी-सैटेलाइट टेस्ट ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी NRO को चौंका दिया था।
पूर्व अमेरिकी एयरफोर्स इंटेलिजेंस ऑफिसर David Grusch ने एक पॉडकास्ट के दौरान 27 मार्च, 2019 को हुए 'मिशन शक्ति' (ASAT टेस्ट) को लेकर बड़ी बात कही है। ग्रुश, जो उस समय नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस (NRO) में इंटेलिजेंस के बैकअप डायरेक्टर थे, ने बताया कि भारतीय अधिकारियों द्वारा मिसाइल लॉन्च के लिए नोटिस (NOTAM) जारी करने के बावजूद, अमेरिकी खुफिया महकमे में उस दिन काफी अफरा-तफरी का माहौल था।
स्पेस मॉनिटरिंग में आई चुनौतियां
NRO का मुख्य काम अमेरिकी स्पाई सैटेलाइट्स की सुरक्षा करना है। ग्रुश के मुताबिक, सबसे बड़ी चिंता उस मलबे (Debris) को लेकर थी जो माइक्रोसेट-आर (Microsat-R) सैटेलाइट के नष्ट होने से पैदा हुआ था। एजेंसियों को तुरंत यह आकलन करना पड़ा कि क्या यह मलबा अमेरिकी संपत्तियों के लिए कोई खतरा पैदा करेगा। यह घटना दिखाती है कि अंतरिक्ष-आधारित डिफेंस गतिविधियों को रियल-टाइम में मॉनिटर करना कितना जटिल काम है।
भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए क्या हैं मायने?
निवेशकों के नजरिए से देखें, तो यह परीक्षण भारत की स्वदेशी (Atmanirbhar Bharat) तकनीक का एक बड़ा मील का पत्थर है। रडार ट्रैकिंग, मिसाइल गाइडेंस और हाई-स्पीड इंटरसेप्शन जैसी क्षमताओं का प्रदर्शन डीआरडीओ (DRDO) की परिपक्वता को दर्शाता है। ऐसी तकनीकी सफलताएं भविष्य में रक्षा बजट के आवंटन और घरेलू कंपनियों को मिलने वाले बड़े ऑर्डर्स की राह आसान करती हैं।
भू-राजनीतिक (Geopolitical) संदर्भ
हालांकि यह घटना अब पुरानी हो चुकी है, लेकिन यह अंतरिक्ष के सैन्यीकरण और स्पेस सुरक्षा को लेकर वैश्विक बहस में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनी हुई है। भारत जिस तरह से अपने स्पेस और डिफेंस फुटप्रिंट का विस्तार कर रहा है, वह ग्लोबल स्तर पर 'डुअल-यूज़' (Dual-use) तकनीक के महत्व को और अधिक बढ़ा रहा है, जो कमर्शियल और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
