अमेरिका ने अपने सैटेलाइट नेटवर्क की सुरक्षा के लिए 'ऑन-ऑर्बिट स्पेस-कंट्रोल वेपन्स' की तैनाती की पुष्टि की है। इस कदम से ग्लोबल सिक्योरिटी बैलेंस में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है, जिससे आने वाले समय में ऑर्बिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर डिफेंस बजट का खर्च बढ़ सकता है।
स्पेस में हथियारों की एंट्री
अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर 'ऑन-ऑर्बिट स्पेस-कंट्रोल वेपन्स' (OOSCW) की तैनाती को स्वीकार कर लिया है। अधिकारियों के मुताबिक, यह कदम मुख्य रूप से रक्षात्मक है, जिसका मकसद विदेशी हस्तक्षेप से अपने सैटेलाइट्स को सुरक्षित रखना है। यह घटनाक्रम स्पेस को लेकर ग्लोबल पावर डायनेमिक्स को पूरी तरह बदलने वाला है।
कानूनी पेंच और निवेश पर असर
1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' ऑर्बिट में सामूहिक विनाश के हथियारों पर तो रोक लगाती है, लेकिन पारंपरिक हथियारों पर यह संधि खामोश है। इसी कानूनी खामी का फायदा उठाकर दुनिया भर की महाशक्तियां अब अपने स्पेस-बेस्ड डिफेंस प्रोग्राम्स को तेज कर सकती हैं। एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनियों के लिए अब फोकस साइंटिफिक प्रोजेक्ट्स से हटकर सैटेलाइट सिक्योरिटी और हार्डन ऑर्बिटल हार्डवेयर की ओर शिफ्ट होने की पूरी संभावना है।
भारत के लिए क्या है संकेत?
भारतीय नजरिए से देखें तो ISRO और निजी स्पेस स्टार्टअप्स के बढ़ते इकोसिस्टम के बीच यह ग्लोबल ट्रेंड महत्वपूर्ण है। भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर, खासकर सैटेलाइट कम्युनिकेशन, प्रिसिजन सेंसर और सर्विलांस सिस्टम वाली कंपनियों पर अब सरकार के खर्च का नया समीकरण देखने को मिल सकता है।
हालांकि, स्पेस का यह मिलिट्रीकरण जियोपॉलिटिकल तनाव भी बढ़ा सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर निर्भर रहने वाली एयरोस्पेस कंपनियों के लिए अनिश्चितता का माहौल बन सकता है। निवेशकों को इस बात पर कड़ी नजर रखनी होगी कि सरकारी बजट में स्पेस-डिफेंस के लिए कितना फंड एलोकेट होता है और इसका असर कमर्शियल प्रोजेक्ट्स पर क्या पड़ता है।
