Skyroot Aerospace: भारत की पहली स्पेस यूनिकॉर्न बनी, वैल्यूएशन **1.1 अरब डॉलर** पार!

AEROSPACE-DEFENSE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Skyroot Aerospace: भारत की पहली स्पेस यूनिकॉर्न बनी, वैल्यूएशन **1.1 अरब डॉलर** पार!
Overview

हैदराबाद की Skyroot Aerospace ने **60 मिलियन डॉलर** की एक बड़ी फंडिंग जुटाई है, जिससे कंपनी का वैल्यूएशन बढ़कर **1.1 अरब डॉलर** हो गया है। इस शानदार उपलब्धि के साथ, Skyroot भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी बन गई है।

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1.1 अरब डॉलर के पार पहुंची Skyroot, बनी भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न

Skyroot Aerospace ने हाल ही में 60 मिलियन डॉलर की एक महत्वपूर्ण फंडिंग राउंड पूरा किया है। इस निवेश के बाद कंपनी का वैल्यूएशन 1.1 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जो कि भारत के एयरोस्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ा माइलस्टोन है। यह Skyroot को देश की पहली 'स्पेस-टेक यूनिकॉर्न' बनाता है। इस फंडिंग राउंड का नेतृत्व Sherpalo Ventures और सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फंड GIC ने किया।

नए निवेशक और बढ़ता भरोसा

इस राउंड में Greenko Group के संस्थापकों, Playbook Partners और Shanghvi Family Office जैसे नए निवेशकों ने भी पैसा लगाया है। साथ ही, मार्च 2026 में BlackRock जैसे ग्लोबल एसेट मैनेजर्स ने कंपनी को डेट फाइनेंसिंग (Debt Financing) के जरिए सहारा दिया है। यह निवेशकों का कंपनी की टेक्नोलॉजी और भारत के बढ़ते प्राइवेट स्पेस सेक्टर पर बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।

स्पेस मार्केट में भारत का दबदबा

Skyroot का यह मुकाम ऐसे समय पर आया है जब ग्लोबल और डोमेस्टिक स्पेस टेक्नोलॉजी मार्केट में तेजी देखी जा रही है। 2025 में ग्लोबल स्पेस टेक वेंचर कैपिटल फंडिंग 12.4 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जो पिछले साल से 48% ज्यादा है। भारत का स्पेस सेक्टर भी इस ग्रोथ को फॉलो कर रहा है, जहां 2019 में कुछ ही स्टार्टअप थे, वहीं अब 400 से ज्यादा स्टार्टअप्स हैं और पिछले पांच सालों में 600 मिलियन डॉलर से अधिक का प्राइवेट इन्वेस्टमेंट आया है। अनुमान है कि भारतीय स्पेस इकोनॉमी 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।

विक्रम-1 रॉकेट और बाजार में स्थिति

Skyroot का मुख्य प्रोडक्ट 'विक्रम-1' रॉकेट भारत का पहला प्राइवेटली डेवलप ऑर्बिटल लॉन्च रॉकेट है। यह छोटे सैटेलाइट लॉन्च की बढ़ती मांग को पूरा करेगा, जो ग्लोबल लॉन्च का 75% से अधिक हिस्सा हो सकते हैं। कंपनी का दावा है कि लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) तक प्रति किलोग्राम लागत अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में 40% कम है। हालांकि, Skyroot को घरेलू स्तर पर Agnikul Cosmos और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर SpaceX, Rocket Lab जैसी बड़ी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

इतनी बड़ी फंडिंग और वैल्यूएशन के बावजूद, Skyroot के सामने कुछ बड़ी चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी चुनौती जून 2026 तक 'विक्रम-1' रॉकेट का सफल लॉन्च है। लॉन्च में देरी या विफलता निवेशकों के भरोसे को डगमगा सकती है। स्पेस लॉन्च इंडस्ट्री में लगातार भारी निवेश की जरूरत होती है। Skyroot पर BlackRock से मिले डेट फाइनेंसिंग की देनदारियाँ भी हैं। इसके अलावा, बढ़ते लॉन्च इंश्योरेंस कॉस्ट और स्पेस डेब्रिस (Space Debris) जैसे खतरे भी मौजूद हैं। 1.1 अरब डॉलर के वैल्यूएशन को सही साबित करने के लिए Skyroot को तेजी से मार्केट शेयर हासिल करना होगा और अपने खर्चों को नियंत्रित रखना होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.