हैदराबाद की Skyroot Aerospace ने श्रीहरिकोटा से अपने Vikram-1 रॉकेट को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। यह भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल मिशन (orbital mission) है, जिसने कंपनी की लॉन्चिंग टेक्नोलॉजी को साबित किया है और उसे कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च सर्विस देने की दौड़ में आगे बढ़ाया है। कंपनी ने अब तक **$155 मिलियन** से ज़्यादा की फंडिंग जुटाई है।
'आगमन' मिशन हुआ सफल, भारत के स्पेस सेक्टर में नया अध्याय
Skyroot Aerospace ने 'आगमन' मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। कंपनी ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से अपने Vikram-1 रॉकेट को लॉन्च किया। यह मिशन भारत के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि यह किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा किया गया पहला ऑर्बिटल मिशन है। रॉकेट ने अपनी उड़ान के सभी चार चरणों को पूरा किया, जिससे कंपनी को रेगुलर कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च ऑपरेशंस की ओर बढ़ने के लिए ज़रूरी डेटा मिल गया है।
स्मॉल सैटेलाइट मार्केट पर फोकस
Vikram-1 को 300 किलोग्राम तक के पेलोड (payload) को लो-अर्थ ऑर्बिट (low-Earth orbit) में ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। कंपनी इस व्हीकल का इस्तेमाल ग्लोबल स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए कर रही है। इस मार्केट में उन कंपनियों की मांग बढ़ रही है जिन्हें अर्थ ऑब्जर्वेशन, टेलीकम्युनिकेशन और डिफेंस प्रोजेक्ट्स के लिए स्पेस तक डेडिकेटेड और ऑन-डिमांड एक्सेस चाहिए। अपने मल्टी-स्टेज लॉन्च सिस्टम को साबित करके, Skyroot ग्लोबल सैटेलाइट ऑपरेटर्स के लिए एक भरोसेमंद और किफायती विकल्प पेश करना चाहती है।
यह मिशन एक टेक्निकल डेमोंस्ट्रेशन (technical demonstration) था, जिसमें Grahaa Space, Cosmoserve और DCubed जैसी कंपनियों के साथ-साथ इंटरनल एक्सपेरिमेंटल पेलोड्स भी शामिल थे। यह सफल लॉन्च नवंबर 2022 में Vikram-S रॉकेट के सब-ऑर्बिटल टेस्ट के बाद कंपनी की इंजीनियरिंग क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत देता है।
फंडिंग और भविष्य की राह
2018 में ISRO के पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका द्वारा स्थापित Skyroot ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स से काफी कैपिटल आकर्षित किया है। कंपनी ने GIC, Temasek और Peak XV Partners जैसे बड़े फंड्स से अब तक करीब $155 मिलियन की कुल फंडिंग हासिल की है। $1 बिलियन से ज़्यादा के वैल्यूएशन के साथ 'यूनिकॉर्न' का दर्जा हासिल करने वाली कंपनी पर अब अपने लॉन्च शेड्यूल की कमर्शियल व्यवहार्यता साबित करने का दबाव है। एडवांस्ड रॉकेट टेक्नोलॉजी को डेवलप और मेंटेन करने के लिए लगातार कैपिटल खर्च की ज़रूरत होती है, और इन्वेस्टर शायद यह देखेंगे कि कंपनी इन टेक्निकल माइलस्टोन्स को लॉन्ग-टर्म कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट्स में कैसे बदलती है।
भले ही कंपनी भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में सबसे आगे है, लेकिन यह एक हाई-कैपिटल-इंटेंसिव इंडस्ट्री (high-capital-intensive industry) में काम करती है जिसमें इनहेरेंट टेक्निकल रिस्क (inherent technical risks) भी हैं। भविष्य के मिशन की सफलता के लिए हाई लॉन्च सक्सेस रेट (high launch success rate) बनाए रखना और मैन्युफैक्चरिंग व लॉन्च लॉजिस्टिक्स की लागतों को मैनेज करना ज़रूरी होगा। स्थापित ग्लोबल लॉन्च प्रोवाइडर्स के साथ कंपीट करने की कंपनी की क्षमता भी विक्रम सीरीज़ की कॉस्ट-एफिशिएंसी (cost-efficiency) पर निर्भर करेगी।
आगे बढ़ते हुए, हितधारकों के लिए मुख्य फोकस एक्सपेरिमेंटल फ्लाइट्स से रेगुलर, शेड्यूल्ड कमर्शियल लॉन्च की ओर ट्रांज़िशन (transition) करना होगा। इन्वेस्टर और इंडस्ट्री के लोग कंपनी की सैटेलाइट ऑपरेटर्स के साथ लॉन्ग-टर्म सर्विस एग्रीमेंट्स (long-term service agreements) सुरक्षित करने और अगले मिशनों में अपने टेक्निकल परफॉरमेंस रिकॉर्ड को बनाए रखने की क्षमता पर नज़र रखेंगे।
