सरकारी कंपनी AWEIL के बनाए छोटे हथियारों में क्वालिटी की भारी खामियां सामने आई हैं। संसद की लोक लेखा समिति (PAC) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इन खामियों के चलते सेना के **269** हथियार इस्तेमाल के दौरान फेल हो गए। इससे देश के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग की हकीकत पर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्वालिटी में बड़ी गड़बड़ियां
PAC की रिपोर्ट, जो 12 अगस्त, 2026 को पेश की गई, ने AWEIL के प्रोडक्शन सिस्टम में गहरी खामियां बताई हैं। CAG के आंकड़ों के मुताबिक, सेना के जो हथियार फेल हुए, उनमें से कई अपनी तय उम्र पार कर चुके थे। इनमें घटिया मटेरियल का इस्तेमाल, पुर्जों में गलत हार्डनेस और स्पेसिफिकेशन्स को पूरा न करने वाली मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस जैसी दिक्कतें थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि AWEIL के इंटरनल क्वालिटी चेक इतने मजबूत नहीं थे कि इन डिफेक्ट्स को यूजर तक पहुंचने से रोक सकें।
यह रिपोर्ट पब्लिक-सेक्टर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में रिस्क को दर्शाती है। पुरानी प्रोडक्शन मेथड्स और मॉडर्न क्वालिटी चेक को अपनाने में धीमी रफ्तार की वजह से स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्शन की क्वालिटी पर असर पड़ा है। कमेटी ने सलाह दी है कि मैन्युफैक्चरिंग साइकिल में ही रियल-टाइम क्वालिटी मॉनिटरिंग पर जोर देना चाहिए।
सेना की कम मांग, प्रोडक्शन पर असर
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि AWEIL अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी का इस्तेमाल ठीक से नहीं कर पा रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2015-16 से 2019-20 के बीच, सेना से छोटे हथियारों की मांग बहुत कम रही। कुल प्रोडक्शन का सिर्फ 10% ही सेना को सप्लाई हुआ। इसके चलते AWEIL को मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स से छोटे ऑर्डर पर निर्भर रहना पड़ा, जो कि उनकी पूरी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी का इस्तेमाल करने के लिए काफी नहीं था।
यह डिफेंस सेक्टर के लिए एक बड़ी बिजनेस चुनौती है। जब किसी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के पास अपने मुख्य ग्राहक से लगातार ऑर्डर नहीं आते, तो उसकी प्रॉफिटेबिलिटी और ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर दबाव बनता है। ऑर्डीनेंस फैक्ट्रियों को मॉडर्न बनाने में भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट लग रहा है, लेकिन इसका रिटर्न डिमांड की स्टेबिलिटी और प्राइवेट कंपनियों से कॉम्पिटिशन पर निर्भर करेगा।
आगे क्या?
AWEIL एक सरकारी कंपनी है और पब्लिकली लिस्टेड नहीं है, इसलिए इसका कोई शेयर प्राइस नहीं है। हालांकि, यह रिपोर्ट डिफेंस सेक्टर में इन्वेस्ट करने वालों के लिए एक अहम इंडिकेटर है। यह 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत डिफेंस प्रोडक्शन को बढ़ाने की कोशिशों की चुनौतियों को भी बताती है।
आगे चलकर, सरकार क्वालिटी एश्योरेंस एजेंसियों और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के बीच बेहतर तालमेल के लिए पॉलिसी रिफॉर्म्स पर ध्यान दे सकती है। डिफेंस सेक्टर पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स को यह देखना होगा कि क्या इन फाइंडिंग्स के चलते प्रोडक्शन प्राइवेट प्लेयर्स को आउटसोर्स किया जाएगा या मौजूदा ऑर्डीनेंस फैक्ट्री स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव किए जाएंगे।
