सरकार ने नेशनल सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए ₹26,968 करोड़ के 'Space-Based Surveillance' प्रोग्राम को मंजूरी दे दी है। इसके तहत कुल 52 सैटेलाइट लॉन्च किए जाएंगे, जिनमें से 31 सैटेलाइट्स को प्राइवेट कंपनियां तैयार करेंगी।
भारत अब अंतरिक्ष की सुरक्षा को लेकर आक्रामक रुख अपना रहा है। सरकार ने 'Space-Based Surveillance' (SBS) प्रोग्राम के तीसरे चरण को हरी झंडी दे दी है, जिसकी कुल वैल्यू ₹26,968 करोड़ है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद अंतरिक्ष में भारत की निगरानी क्षमताओं को अपग्रेड करना है, जिसके लिए 52 सैटेलाइट्स का नेटवर्क तैनात किया जाएगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दुनिया भर में ऑर्बिटल एसेट्स पर बढ़ते खतरों, जैसे जैमिंग और एंटी-सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, को काउंटर करना जरूरी हो गया है।
प्राइवेट सेक्टर के लिए बड़ा मौका
इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे अहम पहलू सरकार का प्राइवेट कंपनियों पर भरोसा जताना है। कुल 52 में से 31 सैटेलाइट्स को भारतीय प्राइवेट स्पेस-टेक कंपनियां विकसित करेंगी। यह पहली बार है जब प्राइवेट प्लेयर सिर्फ कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों से ऊपर उठकर नेशनल सिक्योरिटी प्रोजेक्ट्स के लिए प्राइम कॉन्ट्रैक्टर्स की भूमिका में आ रहे हैं। यह 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और अवसर
हालाँकि यह प्रोजेक्ट स्पेस-टेक कंपनियों के लिए रेवेन्यू के नए रास्ते खोलता है, लेकिन इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। इतने एडवांस सैटेलाइट्स बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कैपिटल खर्च और हाई-लेवल टेक्निकल स्किल्स की जरूरत होती है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि डिफेंस प्रोजेक्ट्स का काम काफी लंबा चलता है और रेवेन्यू कई सालों में आता है। इसके अलावा, ऑर्बिटल पोजीशनिंग और डेटा सिक्योरिटी जैसी जटिलताओं के चलते प्रोजेक्ट में देरी का जोखिम हमेशा बना रहता है।
डिफेंस सेक्टर में हलचल
मौजूदा समय में भारत का एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर काफी एक्शन में है। सरकारी कंपनियां जैसे Bharat Electronics (BEL) और Hindustan Aeronautics (HAL) के साथ-साथ कई नई प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स भी इस तेजी का फायदा उठा रही हैं। SBS प्रोजेक्ट अब सैटेलाइट कम्युनिकेशन और सर्विलांस उपकरणों के लिए एक नई डिमांड पैदा करेगा। आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि किन प्राइवेट कंपनियों को ये कॉन्ट्रैक्ट्स मिलते हैं और उनकी डिलीवरी टाइमलाइन क्या रहती है। निवेशकों को डिफेंस और स्पेस-टेक फर्मों के ऑर्डर बुक अपडेट्स पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
