DRDO ने अपनी स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम के विकास के लिए दूसरे चरण की शुरुआत कर दी है। इस तकनीक के जरिए इंडियन नेवी की Kalvari-class सबमरीन्स की पानी के अंदर रहने की क्षमता बढ़ जाएगी, जिसे **2027** तक तैनात करने का लक्ष्य है।
डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम को हकीकत में बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स की सबसे बड़ी कमजोरी उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत होती है, जिससे उनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है। हाइड्रोजन-बेस्ड फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग करने वाला यह नया AIP सिस्टम सबमरीन को लंबे समय तक पानी के अंदर रहने की ताकत देगा, जिससे उसकी 'स्टेल्थ' (छिपने की क्षमता) कई गुना बढ़ जाएगी।
कौन कर रहा है काम?
वर्तमान में इस सिस्टम के एनर्जी मॉड्यूल की टेस्टिंग चल रही है। Larsen & Toubro (L&T) गुजरात के हजीरा में अपने फैसिलिटी सेंटर पर ट्रायल प्रोटोकॉल संभाल रही है, जिससे तकनीक को लैब से निकालकर इंडस्ट्रियल स्केल पर मैन्युफैक्चरिंग के लिए तैयार किया जा सके। एक बार पावर प्रोडक्शन टेस्ट सफल होने के बाद, Mazagon Dock Shipbuilders Limited इस मॉड्यूल को इंडियन नेवी की Kalvari-class सबमरीन्स में फिट करने का काम करेगी। सरकार ने 2027 तक इसके इंटीग्रेशन का डेडलाइन तय किया है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
डिफेंस सेक्टर के निवेशकों के लिए यह 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक बड़ा माइलस्टोन है। विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होने से भविष्य में लागत घटेगी और सप्लाई चेन मजबूत होगी। हालांकि, इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पुरानी सबमरीन में इस जटिल हाइड्रोजन तकनीक को फिट करना एक बड़ा इंजीनियरिंग चैलेंज है। साथ ही, डिफेंस प्रोजेक्ट्स में अक्सर समय सीमा में देरी और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने का जोखिम बना रहता है। फिलहाल, बाजार की नजरें हजीरा फैसिलिटी में चल रहे पावर ट्रायल्स के नतीजों और शिपयार्ड में इंटीग्रेशन की डेडलाइन्स पर टिकी रहेंगी।
