Ordnance Factory Board (OFB) के बंटवारे के 5 साल बाद 7 Defence PSUs की वित्तीय स्थिति और उनके कामकाज के मॉडल पर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या दिखावटी मुनाफे के पीछे कोई बड़ा रिस्क छुपा है?
अक्टूबर 2026 में ऐतिहासिक Ordnance Factory Board को 7 स्वतंत्र Defence Public Sector Undertakings (DPSUs) में पुनर्गठित किए हुए 5 साल पूरे हो चुके हैं। इस रिफॉर्म का मकसद इन कंपनियों की कार्यक्षमता को बढ़ाना और उन्हें कमर्शियल रूप से सक्षम बनाना था, लेकिन अब इनकी रिपोर्टिंग और डिफेंस सप्लाई चेन में इनकी बदलती भूमिका पर गंभीर बहस छिड़ गई है।
रेवेन्यू का गणित: हकीकत या दिखावा?
निवेशकों और एनालिस्टों के बीच सबसे बड़ी चिंता रेवेन्यू रिपोर्टिंग को लेकर है। बंटवारे से पहले, ये फैक्ट्रियां एक ही सरकारी विभाग का हिस्सा थीं, इसलिए आपस में सामान का आदान-प्रदान 'इंटरनल मूवमेंट' माना जाता था। अब, नई कॉर्पोरेट संरचना में इसे 'कमर्शियल सेल' के तौर पर दर्ज किया जा रहा है। इस अकाउंटिंग बदलाव के कारण टर्नओवर के आंकड़े पहले की तुलना में काफी ज्यादा दिख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अगर इन इंटरनल ट्रांजेक्शन को बारीकी से नहीं देखा गया, तो ग्रोथ असल उत्पादन से कहीं ज्यादा मजबूत लग सकती है।
शॉर्ट-टर्म बनाम लॉन्ग-टर्म फोकस
पहले इन फैसिलिटीज का एकमात्र लक्ष्य भारतीय सेना के लिए भरोसेमंद हार्डवेयर तैयार करना था। आज, कंपनियां EBITDA जैसे कमर्शियल मेट्रिक्स पर फोकस कर रही हैं। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के 'शॉर्ट-टर्म' वित्तीय लक्ष्यों के चक्कर में, भविष्य के जटिल कॉम्बैट प्लेटफॉर्म्स के लिए जरूरी लंबी अवधि वाले रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर असर पड़ सकता है।
प्राइवेट सेक्टर के साथ बदलता समीकरण
डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में अब सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के बीच तालमेल बदल रहा है। बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट कंपनियों को मिल रहे हैं, जबकि सरकारी फैक्ट्रियां केवल सेकेंडरी सप्लायर बनकर रह गई हैं। सवाल यह है कि क्या सरकारी कंपनियां अपनी पुरानी मैन्युफैक्चरिंग तकनीक और निवेश का सही मूल्य वसूल पा रही हैं?
आने वाले समय में निवेशकों की नजरें ऑर्डर बुक की क्वालिटी और R&D की प्रगति पर रहेंगी। यह देखना अहम होगा कि क्या ये कंपनियां केवल कंपोनेंट सप्लायर बनकर रह जाएंगी या फिर वे भविष्य के जटिल युद्धक हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर पाएंगी।
