Raymond और Apollo Micro Systems जैसी प्राइवेट डिफेंस कंपनियों के शेयरों में जोरदार तेजी देखी जा रही है। इसकी मुख्य वजह है इन कंपनियों की मजबूत होती ऑर्डर बुक और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती हिस्सेदारी।
भारत के डिफेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सरकार अब सरकारी कंपनियों को सीधे कॉन्ट्रैक्ट देने के बजाय 'कॉम्पिटिटिव बिडिंग' (Competitive Bidding) पर जोर दे रही है, जिसका सीधा फायदा प्राइवेट कंपनियों को हो रहा है। इसी का नतीजा है कि कुल डिफेंस रेवेन्यू में प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी 9% (FY23) से बढ़कर 16% (FY26) तक पहुंच गई है।
कंपनियों का जलवा
ऑर्डर्स की बात करें तो Raymond के पास अब ₹5,960 करोड़ से ज्यादा की ऑर्डर बुक है, जिसमें एयरक्राफ्ट इंजन के पार्ट्स पर फोकस है। वहीं, Apollo Micro Systems ने भी FY27 की पहली तिमाही तक अपनी ऑर्डर बुक को ₹1,704 करोड़ तक पहुंचा दिया है। कंपनी अब इलेक्ट्रॉनिक्स के अलावा रॉकेट मोटर्स और एक्सप्लोसिव्स जैसे जटिल क्षेत्रों में भी कदम रख रही है।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks)
इन्वेस्टर्स को यह समझना होगा कि सिर्फ ऑर्डर मिलना ही काफी नहीं है। डिफेंस सेक्टर में समय पर डिलीवरी और बजट के अंदर काम पूरा करना एक बड़ी चुनौती है। कॉस्ट ओवररन्स (Cost Overruns), सरकारी नीतियों में बदलाव और कच्चे माल की कमी जैसे रिस्क हमेशा बने रहते हैं। इसके अलावा, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भारी निवेश की जरूरत होती है, जो शॉर्ट टर्म में कैश फ्लो और मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
ग्लोबल मार्केट में भी भारतीय हथियारों की धाक जम रही है। Akashteer कमांड सिस्टम और BrahMos मिसाइल जैसे स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्ट्स की साख बढ़ी है। वहीं, Unimech जैसी कंपनियां अब एयरक्राफ्ट के मेंटेनेंस और रिपेयर (MRO) सेगमेंट में उतर रही हैं, जो एक रेगुलर इनकम का जरिया बन सकता है।
अब निवेशकों की नजरें इस बात पर होनी चाहिए कि कंपनियां अपनी इस बड़ी ऑर्डर बुक को कितनी तेजी से रेवेन्यू में बदलती हैं और स्केलिंग के दौरान मार्जिन कैसे बनाए रखती हैं।
