Indian Navy ने अपनी पुरानी इजरायली सैटेलाइट कम्युनिकेशन प्रणाली को बदलने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए देश में ही बने 'Rukmini' टर्मिनलों का इस्तेमाल किया जाएगा, जो 'Make-II' कैटेगरी के तहत विकसित होंगे।
भारतीय नौसेना अपने संचार ढांचे में एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। पिछले एक दशक से अधिक समय से इस्तेमाल किए जा रहे इजरायली सैटेलाइट टर्मिनलों को अब चरणबद्ध तरीके से बाहर किया जा रहा है। नौसेना का लक्ष्य अब आधुनिक GSAT-7R सैटेलाइट नेटवर्क के साथ तालमेल बिठाना है, जिससे पनडुब्बियों से लेकर युद्धपोतों तक डेटा, आवाज और वीडियो ट्रांसमिशन पहले से अधिक सुरक्षित हो सके।
मेक-इन-इंडिया का नया अध्याय
इस प्रोजेक्ट को 'Defence Acquisition Procedure' के तहत 'Make-II' कैटेगरी में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि प्रोटोटाइप विकसित करने की पूरी वित्तीय जिम्मेदारी निजी कंपनियों, खास तौर पर स्टार्ट-अप्स और MSMEs की होगी। सरकार ने इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी कर दिया है। इस पहल का मकसद सरकारी खजाने पर बोझ डाले बिना निजी क्षेत्र में स्वदेशी तकनीकी क्षमताएं विकसित करना है।
क्यों अहम है यह बदलाव?
वर्तमान में Bharat Electronics Limited (BEL) इजरायली प्रणालियों का रखरखाव करती है। नई योजना के तहत, नए टर्मिनलों में कम से कम 50% स्वदेशी सामग्री अनिवार्य कर दी गई है। यह कदम सरकार के 'आत्मनिर्भरता' मिशन को मजबूती देता है, ताकि मिशन-क्रिटिकल रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम हो सके।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में यह बदलाव नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। हालांकि, 'Make-II' मॉडल निजी खिलाड़ियों के लिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि शुरुआती फंडिंग का जोखिम उन्हीं पर है और उन्हें सख्त मिलिट्री मानकों पर खरा उतरना होगा। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि घरेलू निर्माता किस तरह से इन जटिल हार्डवेयर को GSAT-7R नेटवर्क के साथ सफलतापूर्वक जोड़ पाते हैं।
