Indian Navy ने देश में ही अत्याधुनिक रक्षा तकनीक विकसित करने के लिए **₹1,900 करोड़** से ज्यादा के कॉन्ट्रैक्ट्स साइन किए हैं। 'स्वावलंबन' प्रोग्राम के तहत स्टार्टअप्स और MSMEs को बड़ा मौका मिलेगा।
भारतीय नौसेना अब पूरी तरह से 'आत्मनिर्भर' होने की राह पर है। हाल ही में नौसेना ने ₹1,900 करोड़ से अधिक के कॉन्ट्रैक्ट्स को अंतिम रूप दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करना है। यह पूरी कवायद 'स्वावलंबन' पहल का हिस्सा है, जिसके तहत 26 और 27 अक्टूबर को मानेकशॉ सेंटर में एक सेमिनार भी आयोजित किया जाएगा।
तकनीक पर खास फोकस
नौसेना का पूरा जोर भविष्य की चुनौतियों से निपटने पर है। इन कॉन्ट्रैक्ट्स में निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा रहा है:
- क्वांटम पोजिशनिंग सिस्टम: बिना सैटेलाइट सिग्नल के भी सटीक लोकेशन की जानकारी।
- माइक्रोवेव हथियार: आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से तैयार हथियार।
- अंडरवाटर व्हीकल्स: बड़े आकार के ऑटोनॉमस (स्वचालित) पानी के नीचे चलने वाले वाहन।
कैसे काम करेगा यह मॉडल?
नौसेना इसके लिए iDEX (Innovations for Defence Excellence) फ्रेमवर्क का उपयोग कर रही है। इसमें करीब 150 स्टार्टअप्स और MSMEs सीधे तौर पर जुड़े हैं। अब तक 4,000 से ज्यादा प्रस्तावों की समीक्षा की जा चुकी है और ₹3,500 करोड़ से ज्यादा के प्रोजेक्ट्स 'एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी' (AON) स्टेज से गुजर रहे हैं।
वाइस एडमिरल अजय कोचर ने 'स्पाइरल डेवलपमेंट' रणनीति का जिक्र किया है। इसमें सीधे तैयार उत्पाद खरीदने के बजाय, लगातार टेस्टिंग और फीडबैक के जरिए तकनीक को अपडेट किया जाएगा ताकि वह समय के साथ पुरानी न हो।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं तो हैं, लेकिन 'एग्जीक्यूशन रिस्क' (Execution Risk) भी बड़ा है। प्रोटोटाइप से लेकर मास-प्रोडक्शन तक का सफर तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बाजार पर नजर रखने वालों को यह देखना होगा कि कितनी तेजी से ये कॉन्ट्रैक्ट्स असल तैनाती में बदलते हैं।
