भारत के डिफेंस स्टार्टअप्स अब छोटी कलपुर्जों की सप्लाई से आगे बढ़कर सीधे मिसाइल और ड्रोन जैसे हथियार बना रहे हैं। देश में स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्शन बढ़कर **70%** हो गया है और एक्सपोर्ट्स **₹38,458 करोड़** के पार पहुंच चुके हैं।
मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा बदलाव
भारतीय डिफेंस सेक्टर में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी सरकारी डिफेंस कंपनियों के लिए छोटे कलपुर्जे बनाने वाली स्टार्टअप्स अब पूरी तरह से 'Combat Systems' जैसे ड्रोन, मिसाइल और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी तैयार कर रही हैं। वर्तमान में प्राइवेट कंपनियां ड्रोन सेगमेंट में दबदबा बनाए हुए हैं और 12 से ज्यादा मिसाइल सिस्टम्स के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
नई चुनौतियां और अवसर
सिस्टम मैन्युफैक्चरिंग में जाना आसान नहीं है। इसमें भारी निवेश, एडवांस R&D और हाई-लेवल टेक्निकल कैपेबिलिटी की जरूरत होती है। हालांकि, यह बदलाव बेहतर प्रॉफिट मार्जिन के द्वार खोलता है, लेकिन इसमें रिसर्च का लंबा समय और सख्त सरकारी अप्रूवल जैसी जटिलताएं भी जुड़ी हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि स्टार्टअप्स कैसे अपने प्रोटोटाइप को लार्ज-स्केल फील्ड डिप्लॉयमेंट में बदल पाते हैं।
सरकारी सपोर्ट का असर
'iDEX' (Innovations for Defence Excellence) जैसे प्रोग्राम्स ने गेम चेंजर का काम किया है। इन स्कीमों के जरिए 700 से ज्यादा स्टार्टअप्स को कैपिटल और बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स तक पहुंच मिली है। इसी का नतीजा है कि रक्षा उपकरणों में स्वदेशी कंटेंट पिछले एक दशक में 35% से बढ़कर 70% के स्तर पर पहुंच गया है।
निवेशकों के लिए सलाह
डिफेंस सेक्टर में डिमांड का पाइपलाइन तो मजबूत है, लेकिन यह पूरी तरह से सरकारी बजट और पॉलिसी पर निर्भर है। लंबी डेवलपमेंट टाइमलाइन और कैपिटल-इंटेंसिव ऑपरेशन्स के कारण उन कंपनियों पर नज़र रखना जरूरी है जो बिना कर्ज बढ़ाए (Over-leveraging) अपने ऑर्डर बुक्स को रेवेन्यू में बदलने में सक्षम हैं।
