Indian Army ने अपने ड्रोन बेड़े को सुरक्षित बनाने के लिए 'AASHVAST' पहल के तहत 6 अत्याधुनिक साइबर लैब की शुरुआत की है। यह लैब ड्रोन्स में मौजूद विदेशी मालवेयर और सिक्योरिटी खामियों की पहचान करेंगी, जो आने वाले समय में डिफेंस सेक्टर की प्रोक्योरमेंट पॉलिसी को पूरी तरह बदल सकता है।
भारतीय सेना ने देश भर में 6 विशेष साइबर प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य सैन्य ड्रोन्स को विदेशी साइबर खतरों से बचाना है। यह पहल 'AASHVAST' के नाम से जानी जा रही है और इसका पहला केंद्र दिल्ली में पहले से ही चालू हो चुका है।
सिक्योरिटी का नया पैमाना
इन लैब्स का काम ड्रोन्स में लगी चिप्स और फर्मवेयर की गहराई से जांच करना है। ये लैब लगभग 14 तरह की गंभीर खामियों को पकड़ सकती हैं, जिनमें रिमोट-एक्सेस टूल्स, टाइम-डिले फॉल्ट्स और लोकेशन-बेस्ड ट्रिगर्स शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट को QuickPay Pvt Ltd ने Directorate General of Electronics and Mechanical Engineers के साथ मिलकर तैयार किया है। आने वाले समय में इस सुरक्षा कवच को CCTV सिस्टम जैसे अन्य उपकरणों तक भी बढ़ाया जाएगा।
डिफेंस स्टॉक्स और 'Atmanirbhar Bharat' पर असर
यह कदम रक्षा क्षेत्र में 'Atmanirbhar Bharat' की नीति को और मजबूती देता है। Ministry of Defence पहले ही कई 'Positive Indigenization Lists' जारी कर चुका है, जो आयात को सीमित करती हैं। अब फर्मवेयर सिक्योरिटी पर जोर देने का मतलब है कि आने वाले समय में उन्हीं वेंडर्स को कॉन्ट्रैक्ट मिलेंगे, जो अपनी सप्लाई चेन और कोडिंग की सुरक्षा की गारंटी दे सकेंगे।
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इन सख्त प्रोटोकॉल के कारण डिफेंस कंपनियों के लिए कंप्लायंस का खर्च बढ़ सकता है, जिससे शुरुआती दौर में प्रोक्योरमेंट टाइमलाइन लंबी हो सकती है। हालांकि, लंबी अवधि में यह उन कंपनियों के लिए बड़ा अवसर है जो स्वदेशी और सुरक्षित टेक्नोलॉजी बनाने में सक्षम हैं।
