रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) साल के अंत तक एक सख्त सुरक्षा नीति लागू करने जा रहा है। इसके तहत अब मिलिट्री ड्रोन में चाइनीज कंपोनेंट्स को पूरी तरह हटाने के लिए **20** से ज्यादा सुरक्षा टेस्ट अनिवार्य होंगे।
सुरक्षा के कड़े मानक
रक्षा मंत्रालय एक नया और कठोर सुरक्षा फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है। इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि डिफेंस ऑपरेशन्स में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के खतरों से सुरक्षित रहें। नई पॉलिसी के तहत ड्रोन हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को 20 से ज्यादा अलग-अलग सुरक्षा टेस्ट से गुजरना होगा, ताकि किसी भी संदिग्ध चाइनीज कंपोनेंट की गुंजाइश न रहे।
डिफेंस सेक्टर में बदलाव
यह नीति फिलहाल गृह मंत्रालय और डीजीसीए (DGCA) के साथ चर्चा के अंतिम चरण में है। अभी तक प्रोक्योरमेंट प्रोसेस में सुरक्षा मानकों को लेकर स्पष्टता की कमी थी, लेकिन अब इन ड्रोन को सख्त इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर स्टैंडर्ड्स को पूरा करना होगा।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि बाजार अब पूरी तरह से 'स्वदेशी तकनीक' (Indigenous Technology) की ओर शिफ्ट हो रहा है। जो कंपनियां स्थानीय R&D पर निवेश कर रही हैं और जिनका सप्लाई चेन चीन पर निर्भर नहीं है, उन्हें भविष्य में बड़े सरकारी ऑर्डर्स मिलने की संभावना है। हालांकि, छोटी अवधि में अनुपालन लागत (Compliance Cost) बढ़ने और डिलीवरी में देरी की चुनौती भी रह सकती है। STQC IT Services और ETDC Bangalore जैसी लैब्स अब पूरे प्रोक्योरमेंट लाइफसाइकिल की निगरानी करेंगी।
अंत में, सरकार का 'Make in India' पर जोर अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि रक्षा सौदों की एक अनिवार्य शर्त बनता जा रहा है।
