India-US Deal: एयरोस्पेस सेक्टर में भारत की धाक, ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ा उलटफेर!

AEROSPACE-DEFENSE
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India-US Deal: एयरोस्पेस सेक्टर में भारत की धाक, ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ा उलटफेर!
Overview

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए अंतरिम ट्रेड एग्रीमेंट (Interim Trade Agreement) ने भारतीय एयरोस्पेस (Aerospace) कंपोनेंट्स के लिए अमेरिकी बाज़ार में ज़ीरो-ड्यूटी (Zero-duty) एक्सेस का रास्ता खोल दिया है। इस रणनीतिक कदम से ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) में भारत की स्थिति मज़बूत होगी और देश एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग (Aerospace Manufacturing) में एक प्रमुख ग्लोबल हब (Global Hub) के तौर पर उभरेगा।

ट्रेड डील से एयरोस्पेस में भारत का दबदबा

भारत और अमेरिका के बीच 7 फरवरी 2026 को एक अंतरिम ट्रेड एग्रीमेंट (Interim Trade Agreement) फाइनल हुआ है। इस डील की सबसे बड़ी बात यह है कि इसने भारतीय एयरोस्पेस कंपोनेंट्स (Aerospace Components) के लिए अमेरिकी बाज़ार में ज़ीरो-ड्यूटी (Zero-duty) एक्सेस का रास्ता खोल दिया है। इस कदम से भारत, यूरोप, जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों के बराबर आ खड़ा हुआ है, जो लंबे समय से ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) के मज़बूत खिलाड़ी रहे हैं। इस समझौते के तहत, एयरोस्पेस प्रोडक्ट्स पर लगने वाले आपसी टैरिफ (Tariff) को भी कम किया गया है, जिससे कुछ खास कंपोनेंट्स पर अब ज़ीरो या काफी कम टैक्स लगेगा।

यह सिर्फ एक छोटी-मोटी बढ़ोतरी नहीं, बल्कि भारतीय एयरोस्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम है। इस सेक्टर के 2030 तक बढ़कर 21.48 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसकी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 6.8% रहने की उम्मीद है। अभी ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन में भारत की हिस्सेदारी करीब 2% है, जिसके आने वाले समय में बढ़कर 10% तक पहुंचने की संभावना है। ऐसा इसलिए संभव होगा क्योंकि घरेलू कंपनियां अपने ऑपरेशन बढ़ाएंगी और वैल्यू चेन में ऊपर बढ़ेंगी। भारत को लागत में 15-25% तक की बचत का फायदा मिलेगा, जो इसे दूसरे मैन्युफैक्चरिंग हब के मुकाबले ज़्यादा कॉम्पिटिटिव (Competitive) बनाता है। साथ ही, हमारे पास कुशल इंजीनियरिंग टैलेंट (Skilled Engineering Talent) का बड़ा पूल भी मौजूद है।

OEM कंपनियों की भारत में बढ़ती रुचि

इस डेवलपमेंट का सीधा असर ग्लोबल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) जैसे Boeing और Airbus पर भी पड़ रहा है। वे अब भारत को एक महत्वपूर्ण विदेशी OEM बेस के तौर पर देख रहे हैं। Boeing भारत से अपनी सालाना सोर्सिंग (Sourcing) को लगभग 1.3 अरब डॉलर तक ले जाई है और इसे दोगुना करने की योजना बना रही है, ताकि भारत उसके सबसे बड़े विदेशी कंपोनेंट सप्लायर्स में से एक बन सके। इसी तरह, Airbus भी 2030 तक भारत से अपनी सोर्सिंग को बढ़ाकर 2 अरब डॉलर सालाना करने की योजना बना रही है, जो अभी 1.4 अरब डॉलर है। वे भारत की इंजीनियरिंग क्षमता और मैन्युफैक्चरिंग काबिलियत का फायदा उठाना चाहते हैं। यह रणनीतिक बदलाव ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों और विविधीकरण (Diversification) की ज़रूरत का भी नतीजा है।

एविएशन मार्केट में तेज़ी की उम्मीद

यह डील भारत के तेज़ी से बढ़ते एविएशन मार्केट (Aviation Market) के लिए भी बहुत बड़ी खुशखबरी है। अनुमान है कि 2026 तक भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बन जाएगा। सरकारी अधिकारियों का अनुमान है कि आने वाले कुछ सालों में भारतीय एयरलाइन्स (Airlines) 70 अरब से 80 अरब डॉलर तक के एयरक्राफ्ट, इंजन और स्पेयर पार्ट्स का ऑर्डर दे सकती हैं। Air India Group पहले ही 220 Boeing एयरक्राफ्ट और 100 Airbus प्लेन का ऑर्डर दे चुकी है। Boeing 2026 में भारतीय ग्राहकों को करीब 24-25 एयरक्राफ्ट डिलीवर करने की उम्मीद कर रही है, जो प्रोडक्शन रेट में बढ़ोतरी का संकेत देता है। Boeing का अनुमान है कि 2044 तक भारत और दक्षिण एशिया की एयरलाइन्स को लगभग 3,300 नए कमर्शियल जेट्स की ज़रूरत होगी। भारतीय एविएशन मार्केट का साइज 2025 में 14.78 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 16.53 अरब डॉलर होने का अनुमान है, और 2031 तक यह 28.96 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसकी CAGR 11.86% रहने की उम्मीद है। इस ग्रोथ का मुख्य कारण मज़बूत आर्थिक विस्तार, बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग और यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी है, जो 2025 में 9% बढ़ी थी।

चुनौतियां और जोखिम

हालांकि, इस उम्मीद भरी तस्वीर के बावजूद, कुछ चुनौतियां और संरचनात्मक अड़चनें भी हैं जो तत्काल बढ़त को सीमित कर सकती हैं। सबसे बड़ा जोखिम उद्योग का बड़ी OEM कंपनियों जैसे Boeing और Airbus पर निर्भर होना है। उनके प्रोडक्शन शेड्यूल या ग्लोबल डिमांड में कोई भी उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय सप्लायर्स को प्रभावित कर सकता है। Boeing के प्रोडक्शन में देरी, जो रेगुलेटरी एक्शन (Regulatory Actions) और ऑपरेशनल दिक्कतों के चलते हो रही है, पहले ही भारतीय एयरलाइन्स की डिलीवरी की समय-सीमा को प्रभावित कर चुकी है, जिससे फ्लीट विस्तार की योजनाएं धीमी हो सकती हैं।

इसके अलावा, भारत के पास बड़ा इंजीनियरिंग टैलेंट तो है, लेकिन मशीनिंग से आगे बढ़कर वैल्यू चेन के उच्च-मूल्य वाले सेगमेंट (Higher-value segments) पर कब्ज़ा करने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाना एक बड़ी बाधा है। स्किल डेवलपमेंट, कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Investment) और सर्टिफिकेशन प्रक्रियाओं में अड़चनें लगातार ध्यान मांगेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएं, अपर्याप्त विशेष सुविधाएं और विदेशी सप्लायर्स पर तकनीकी निर्भरता भी आत्मनिर्भरता और सप्लाई चेन लचीलेपन (Supply Chain Resilience) के लिए जोखिम पैदा करती हैं। ग्लोबल एयरोस्पेस मार्केट में प्रतिस्पर्धा बहुत ज़्यादा है और यह भू-राजनीतिक उथल-पुथल, OEM के प्रोडक्शन में चुनौतियों और बढ़ती एयरलाइन लागतों जैसी चीज़ों से लगातार प्रभावित हो रहा है।

भविष्य की राह

कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका ट्रेड डील एक शक्तिशाली उत्प्रेरक (Catalyst) साबित हो रही है, जो भारत को ग्लोबल एयरोस्पेस सप्लाई चेन में एक केंद्रीय खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर रही है। तरजीही व्यापार पहुंच, OEM की सोर्सिंग में बदलाव और मज़बूत घरेलू बाज़ार की मांग मिलकर भारत के एयरोस्पेस सेक्टर के लिए ज़बरदस्त ग्रोथ का रास्ता बना रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में बढ़ती भागीदारी और घरेलू एविएशन इंडस्ट्री से भारी एयरक्राफ्ट ऑर्डर के ज़रिए भारत का एयरोस्पेस सेक्टर बड़े विस्तार के लिए तैयार है। एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं, कार्यबल विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश भारत को इस बदली हुई ग्लोबल एयरोस्पेस डायनामिक का पूरा फायदा उठाने और सप्लाई चेन तथा बाज़ार से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद करेगा।

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