रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) ने डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाइसेंस देने की प्रक्रिया को तेज करने का फैसला किया है। अब यह प्रक्रिया **3 हफ्ते** से भी कम समय में पूरी हो जाएगी। इस कदम से कारोबार करने में आसानी (ease of doing business) बढ़ेगी और प्राइवेट सेक्टर में नए निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, निवेशकों को जारी किए गए लाइसेंस और असल प्रोडक्शन के बीच के अंतर पर नजर रखनी होगी, क्योंकि कई लाइसेंस अभी भी निष्क्रिय पड़े हैं।
लाइसेंस की रफ्तार तेज, नए निवेश की उम्मीद
रक्षा मंत्रालय अपनी लाइसेंसिंग प्रक्रिया में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी कर रहा है। लक्ष्य है कि डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाइसेंस मिलने में लगने वाले समय को घटाकर 3 हफ्ते कर दिया जाए। अभी इस प्रक्रिया में कई महीने लग जाते हैं। इस पहल का मकसद कंप्लायंस कॉस्ट (compliance costs) को कम करना और देश के रक्षा उत्पादन (defense production) में प्राइवेट कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना है।
नई प्रक्रिया जल्द होगी लागू
इस संबंध में एक नया कॉन्सेप्ट पेपर (concept paper) तैयार किया गया है, जो फिलहाल कॉमर्स और होम मिनिस्ट्री से मंजूरी का इंतजार कर रहा है। लागू होने के बाद, यह अलग-अलग राज्यों में एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (unified standard operating procedure) लाएगा, जिससे डिफेंस सेक्टर में एंट्री करने वाली कंपनियों के लिए एक अनुमानित माहौल तैयार होगा।
लाइसेंस और असल प्रोडक्शन में बड़ा गैप
हालांकि, यह नीति बदलाव विकास को गति देने के इरादे से किया गया है, लेकिन निवेशकों को जमीनी हकीकत पर भी ध्यान देना चाहिए। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अब तक 871 डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं, लेकिन इनमें से केवल 240 से 250 ही वर्तमान में एक्टिव (active) हैं। यह अंतर बताता है कि सिर्फ लाइसेंस मिलना ही काफी नहीं है, बल्कि असल मैन्युफैक्चरिंग तक पहुंचने में काफी चुनौतियां हैं।
प्रशासनिक प्रक्रिया में भी सुधार
दक्षता बढ़ाने के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया में पहले ही कुछ बदलाव किए जा चुके हैं। मार्च 2025 से, 19 सदस्यों वाली वह मूल्यांकन समिति (evaluation committee) भंग कर दी गई है जो पहले अप्रूवल का काम देखती थी। अब, डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) के एक ज्वाइंट सेक्रेटरी सीधे अप्रूवल दे रहे हैं। इस प्रक्रिया में अब डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) और डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस (DGQA) के साथ सीधी कंसल्टेशन शामिल है, जिससे इंतजार का समय पहले ही कम हो चुका है।
एक्सपोर्ट लाइसेंस पर भी फोकस
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के अलावा, सरकार एक्सपोर्ट लाइसेंस (export licensing) को भी सुव्यवस्थित करने पर विचार कर रही है। भारतीय कंपनियों के लिए, जो ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स को सप्लाई करती हैं, उनके लिए एक बार में कई साल की एक्सपोर्ट अथॉराइजेशन (one-time, multi-year export authorizations) शुरू करने पर चर्चा चल रही है। ओपन जनरल एक्सपोर्ट लाइसेंस (open general export license) के तहत ज्यादा आइटम्स को लाने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स ग्लोबल सप्लाई चेन में बेहतर तरीके से इंटीग्रेट हो सकें।
निवेशकों के लिए अहम बिंदु
निवेशकों के लिए, मुख्य नजर इस बात पर रहेगी कि कितने लाइसेंस असल प्रोडक्शन में बदलते हैं। आसान लाइसेंसिंग 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) पहलों के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर के खिलाड़ियों की लॉन्ग-टर्म सफलता केवल परमिट प्राप्त करने के बजाय प्रोजेक्ट्स को एग्जीक्यूट करने, ऑर्डर सुरक्षित करने और इनोवेट करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी। बाजार के जानकार इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या यह तीन-हफ्ते का लक्ष्य असल में लगातार पूरा होता है और क्या इससे आने वाली तिमाहियों में प्रोडक्शन कैपेसिटी में बढ़ोतरी होती है।
