भारत अपनी मैरीटाइम डिफेंस स्ट्रैटेजी को बदल रहा है। अब मल्टीलैटरल ग्रुप्स के बजाय बायलैटरल एग्रीमेंट्स पर जोर दिया जा रहा है। **$203 मिलियन** की SeaGuardian ड्रोन डील के साथ-साथ नेवल शिपबिल्डिंग में तकनीकी सहयोग से भारतीय डिफेंस कंपनियों के लिए बड़े अवसर खुल रहे हैं।
भारत अपनी इंडो-पैसिफिक डिफेंस स्ट्रैटेजी को पूरी तरह से नया आकार दे रहा है। सरकार अब केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के भरोसे रहने के बजाय, देशों के साथ सीधे तौर पर बायलैटरल यानी द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते कर रही है। इसका मकसद इंटेलिजेंस शेयरिंग और नेवल मेंटेनेंस जैसे मामलों में प्रैक्टिकल और तेज नतीजे हासिल करना है।
सर्विलांस और नेवल टेक का नया दौर
इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है General Atomics से $203 मिलियन में दो MQ-9B SeaGuardian ड्रोन लीज पर लेना। यह सिर्फ एक खरीद नहीं, बल्कि भारत की मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (Maritime Domain Awareness) को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस तकनीक के आने से समुद्री सीमाओं पर निगरानी की क्षमता बढ़ेगी, जिससे डिफेंस टेक कंपनियों के लिए नए रास्ते खुलेंगे।
शिपबिल्डिंग में तकनीकी साझेदारी
जापान के साथ हुआ नया मैरीटाइम सिक्योरिटी पैक्ट इस मामले में बेहद अहम है। यह समझौता केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नेवल डिजाइन और शिप रिपेयरिंग में तकनीकी सहयोग की बात है। भारत अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी के साथ जापान की इंजीनियरिंग एक्सपर्टीज को जोड़ रहा है। 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत, भारतीय शिपबिल्डर्स के लिए यह एक बड़ी अपॉर्चुनिटी है क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार काम सीखने और जॉइंट प्रोजेक्ट्स करने का मौका मिलेगा।
लॉन्ग-टर्म औद्योगिक आत्मनिर्भरता
भारत अब ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों के साथ मिलकर नेवल डिप्लोमेसी बढ़ा रहा है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि सरकार का फोकस 'इंडस्ट्रियल ऑटोनॉमी' यानी औद्योगिक आत्मनिर्भरता पर है। विदेशी तकनीक को भारतीय मैन्युफैक्चरिंग में इंटीग्रेट किया जा रहा है। अब नजरें इस पर होनी चाहिए कि ये समझौते कितने जल्दी ठोस ऑर्डर्स में बदलते हैं, क्योंकि यही चीजें आगे चलकर कंपनियों के मार्जिन और रिवेन्यू ग्रोथ को तय करेंगी।
