सरकार डिफेंस सेक्टर में Foreign Direct Investment (FDI) के नियमों को आसान बनाने पर विचार कर रही है। इस पहल का मुख्य मकसद ग्लोबल पार्टनर्स को आकर्षित करना और साल 2029 तक डिफेंस प्रोडक्शन को **₹3 लाख करोड़** के लक्ष्य तक पहुंचाना है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सुरक्षा मानकों और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की शर्तें अब भी निवेश प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनी रहेंगी।
भारत सरकार डिफेंस सेक्टर में निवेश के माहौल को बदलने की कोशिश में है। Department for Promotion of Industry and Internal Trade की अगुवाई में इस वक्त स्टेकहोल्डर्स के साथ कंसल्टेशन चल रहा है। इसका मकसद विदेशी कंपनियों को भारत में हाई-टेक मिलिट्री टेक्नोलॉजी लाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
FDI का वर्तमान गणित
मौजूदा नियमों के तहत, डिफेंस में ऑटोमैटिक रूट से 74% तक FDI की इजाजत है, जिसके लिए सरकार से मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, इससे ज्यादा के निवेश के लिए सरकारी परमिशन जरूरी है। पुरानी सख्ती का मुख्य कारण यह सुनिश्चित करना था कि विदेशी कंपनियां केवल भारत को एक्सपोर्ट हब के तौर पर न देखें, बल्कि अपनी टेक्नोलॉजी भी भारतीय फर्मों के साथ शेयर करें।
सेक्टर में आ रही रफ्तार
डिफेंस सेक्टर के बढ़ते कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डिफेंस बजट 2013-14 में ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹7.85 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। वहीं, 2025-26 फाइनेंशियल ईयर में एक्सपोर्ट का आंकड़ा ₹38,424 करोड़ रहा, जिसमें प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी 45% से ज्यादा रही है।
निवेशकों के लिए अहम बातें
हाल ही में 28 अगस्त, 2026 को Ministry of Defence ने एक्सपोर्ट प्रोसीजर को आसान बनाने के लिए नए रिफॉर्म्स का ऐलान किया था। हालांकि, नियम आसान होने के बाद भी सरकार उन कंपनियों को प्राथमिकता देगी जो सिर्फ कैपिटल नहीं, बल्कि आधुनिक मिलिट्री हार्डवेयर की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का वादा करेंगी। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर होनी चाहिए कि कौन सी कंपनियां ग्लोबल दिग्गजों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के एग्रीमेंट साइन कर पाती हैं, क्योंकि यही आगे चलकर उनके प्रॉफिट मार्जिन और ऑर्डर बुक को तय करेगा।
