रक्षा क्षेत्र के दिग्गज अनिल के. अग्रवाल ने 2030 तक डिफेंस एक्सपोर्ट का नया लक्ष्य **₹75,000 करोड़** तय करने का सुझाव दिया है, जो सरकार के मौजूदा **₹50,000 करोड़** के टारगेट से काफी ज्यादा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में **₹38,424 करोड़** के रिकॉर्ड एक्सपोर्ट के बाद, अब इंडस्ट्री का ध्यान ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे हाई-टेक सिस्टम्स पर है।
हाई-टेक हथियारों की ओर बढ़ते कदम
भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री अब केवल पारंपरिक हार्डवेयर तक सीमित नहीं है। अब पूरा फोकस ऑटोनॉमस सिस्टम, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर इक्विपमेंट पर है। आधुनिक युद्ध के मैदान में बदलती जरूरतों को देखते हुए, MSMEs और प्राइवेट कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल बिठाया जा रहा है, ताकि नई तकनीक को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सके।
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की ताकत
इस ग्रोथ में पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर दोनों का अहम योगदान है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में कुल डिफेंस एक्सपोर्ट में प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 45% रही, जबकि डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSUs) ने 55% योगदान दिया। ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ नए व्यापार समझौतों से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए विदेशी बाजारों की राह आसान हुई है।
क्या है मार्केट की चुनौती?
हालांकि ग्रोथ की रफ्तार तेज है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। हालिया उछाल का एक बड़ा हिस्सा यूरोप जैसे संघर्ष वाले इलाकों में गोला-बारूद और आर्टिलरी शेल की तात्कालिक मांग के कारण आया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वैश्विक तनाव कम होता है या सप्लाई चेन स्थिर होती है, तो क्या यह रफ्तार बरकरार रह पाएगी? साथ ही, प्राइवेट सेक्टर की प्रोडक्शन क्षमता और कॉस्ट कंट्रोल भी निवेशकों के लिए निगरानी के प्रमुख बिंदु हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में, सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) जरूरतों से हटकर एक्सपोर्ट ऑर्डर कितने स्थिर रहते हैं। हाई-टेक और AI में निवेश लंबे समय के लिए तो पॉजिटिव है, लेकिन इसका असल इम्तिहान तब होगा जब ये तकनीकें लगातार बड़े रेवेन्यू में बदलेंगी। निवेशकों को नए ट्रेड एग्रीमेंट्स और भविष्य के ऑर्डर्स को लेकर कंपनियों की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए।
