सरकार ने डिफेंस एक्सपोर्ट (Defence Export) की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए नए नियमों का ऐलान किया है। लाइसेंस की अवधि को **3 साल** तक बढ़ा दिया गया है, जिससे प्राइवेट सेक्टर को बड़ी राहत मिलेगी। FY26 में डिफेंस एक्सपोर्ट **62.66%** उछलकर **₹38,424 करोड़** हो गया है।
भारत सरकार ने घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को वैश्विक बाजार में मजबूती देने के लिए डिफेंस एक्सपोर्ट फ्रेमवर्क में बड़े बदलाव किए हैं। सरकार ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में बदलाव करते हुए नॉन-लीथल डिफेंस आइटम और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों के लिए भेजे जाने वाले उपकरणों पर अनिवार्य कंसल्टेशन को खत्म कर दिया है। इस कदम से MSMEs को ग्लोबल टेंडर में भाग लेने में अब कम रुकावटों और खर्च का सामना करना पड़ेगा।
लाइसेंसिंग प्रक्रिया में बदलाव
इस अपडेट का मुख्य हिस्सा 'ओपन जनरल एक्सपोर्ट लाइसेंस' (OGEL) फ्रेमवर्क में संशोधन है। पहले अलग-अलग नीतियों के कारण कंपनियों को काफी कन्फ्यूजन होता था, लेकिन अब सरकार ने इसे एक एकीकृत नीति में बदल दिया है। साथ ही, लाइसेंस की वैलिडिटी को 2 साल से बढ़ाकर 3 साल कर दिया गया है। इससे कंपनियों को विदेशी खरीदारों के साथ लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट साइन करने में आसानी होगी।
सेक्टर का प्रदर्शन और आंकड़े
बीता फाइनेंशियल ईयर डिफेंस सेक्टर के लिए शानदार रहा है। FY26 में कुल डिफेंस एक्सपोर्ट में 62.66% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह ₹38,424 करोड़ रहा। इसमें पब्लिक सेक्टर यूनिट्स (DPSUs) की हिस्सेदारी 54.84% और प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी 45.16% रही। वहीं, कुल घरेलू डिफेंस प्रोडक्शन 15.6% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक डिफेंस एक्सपोर्ट को ₹50,000 करोड़ तक ले जाने का है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
भले ही ये नए नियम बिजनेस करना आसान बनाते हैं, लेकिन सेक्टर के सामने अभी भी कुछ स्ट्रक्चरल चुनौतियां हैं। भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक (Importer) बना हुआ है, जो विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता को दर्शाता है।
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि डिफेंस सेक्टर में रेवेन्यू थोड़ा अस्थिर हो सकता है क्योंकि यह अक्सर बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स पर निर्भर करता है। इसके अलावा, प्राइवेट कंपनियों को ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करने के लिए R&D में भारी निवेश करना पड़ रहा है, जो शॉर्ट टर्म में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। भविष्य में वही कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी जो R&D खर्च और मुनाफे के बीच सही तालमेल बिठा सकेंगी।
