ग्लोबल टेंशन का उठा रहे फायदा
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बढ़ता तनाव और पारंपरिक पश्चिमी गठबंधनों में आती दरारें भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक बड़ा अवसर बनकर उभरी हैं। खास तौर पर, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते मतभेद, जैसे कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यूरोपीय नाटो (NATO) देशों को लेकर दिए गए बयान, ने यूरोप को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर बनने पर मजबूर किया है। इसके चलते, यूरोपीय देश तेज़ी से अपनी रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने और नए, भरोसेमंद डिफेंस सप्लायर्स की तलाश में हैं।
इस बदलते परिदृश्य को जनवरी 2026 में हुए ईयू-इंडिया सिक्योरिटी एंड डिफेंस पार्टनरशिप (EU-India Security and Defence Partnership) जैसे समझौतों ने और मज़बूती दी है। यह समझौता मैरीटाइम सिक्योरिटी, डिफेंस इंडस्ट्री, साइबर थ्रेट्स और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को औपचारिक रूप देता है, जो यूरोपियन यूनियन के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के तौर पर पेश करता है। यह दिखाता है कि दोनों पक्ष पारंपरिक, अप्रत्याशित गठबंधनों पर निर्भरता कम करके सीधे और मज़बूत रिश्ते बनाना चाहते हैं।
डोमेस्टिक पॉलिसीज़ का भी मिला सपोर्ट
वैश्विक हलचल के अलावा, भारतीय रक्षा क्षेत्र को डोमेस्टिक यानी घरेलू सरकारी नीतियों का भी ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के यूनियन बजट में मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस (MoD) के लिए रिकॉर्ड ₹7.85 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 15.19% ज़्यादा है। नई इक्विपमेंट पर खर्च 24% बढ़कर ₹1.85 लाख करोड़ हो गया है, जिसमें से 75% हिस्सा सीधे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए आरक्षित है। 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल और स्थानीय उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने से भारतीय कंपनियों के लिए लगातार विकास का माहौल बना है। भारत का लक्ष्य 2029 तक डिफेंस एक्सपोर्ट्स को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाना है, और फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में एक्सपोर्ट्स ₹23,622 करोड़ तक पहुंच चुके हैं।
प्रमुख कंपनियों का शानदार प्रदर्शन
हालिया कॉर्पोरेट नतीजों ने इस सेक्टर की तेजी को और बल दिया है। गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) के शेयरों में तेज़ी देखी गई, खासकर जब कंपनी ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए ₹6,400 करोड़ का रिकॉर्ड एनुअल टर्नओवर दर्ज किया, जो पिछले साल से 26% अधिक है। वहीं, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) को इंडियन एयरफोर्स के लिए माउंटेन रेडार्स की खरीद हेतु डिफेंस मिनिस्ट्री से ₹1,950 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। BEL का फाइनेंशियल ईयर 2025-26 का टर्नओवर करीब ₹26,750 करोड़ रहा है, जो डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स में इसके मज़बूत प्रदर्शन को दर्शाता है।
वैल्यूएशन्स और भविष्य की राह
इस सेक्टर की ग्रोथ स्टोरी भले ही मज़बूत हो, लेकिन वैल्यूएशन्स (Valuations) पर भी नज़र रखना ज़रूरी है। निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स का पी/ई (P/E) रेश्यो करीब 45.72 के आसपास है। वहीं, व्यक्तिगत कंपनियों की बात करें तो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) जैसे स्टॉक्स के पी/ई रेश्योज़ तुलनात्मक रूप से ज़्यादा हैं, जो मौजूदा निवेशकों के विश्वास और भविष्य की विकास उम्मीदों को दर्शाते हैं। ये मल्टीपल्स स्थापित यूरोपीय डिफेंस फर्मों जैसे बीएई सिस्टम्स (BAE Systems) या थेल्स (Thales) से काफी ज़्यादा हैं।
हालांकि, इस सेक्टर में कुछ जोखिम भी मौजूद हैं, जैसे कि कुछ स्टॉक्स का मौजूदा वैल्यूएशन, प्रोजेक्ट्स में देरी की संभावना, और सरकारी खर्च नीतियों पर निर्भरता। लेकिन एनालिस्ट्स का मानना है कि मजबूत ऑर्डर पाइपलाइन, घरेलू मांग और बढ़ती एक्सपोर्ट क्षमताएं इस सेक्टर के लिए आने वाले समय में भी पॉजिटिव आउटलुक बनाए रखेंगी।