ISRO ने उन अटकलों पर विराम लगा दिया है जिनमें एजेंसी के निजीकरण की बात कही जा रही थी। हालांकि, अब रॉकेट असेंबली जैसे बड़े काम निजी कंपनियों जैसे Hindustan Aeronautics Limited और Larsen & Toubro को सौंपे जा रहे हैं, ताकि **$44 अरब** के स्पेस सेक्टर टारगेट को **2033** तक पूरा किया जा सके।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि उसका निजीकरण नहीं किया जा रहा है। हाल ही में सेक्टर के पुनर्गठन को लेकर उड़ी अफवाहों के बाद एजेंसी ने साफ किया कि वह भविष्य में भी फ्रंटियर रिसर्च, डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अहम जिम्मेदारियां संभालती रहेगी। यह सफाई सितंबर 2026 की शुरुआत में कर्मचारी संघों द्वारा उठाए गए सवालों के बाद आई है।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
अफवाहों को बल तब मिला था जब IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयंका ने संकेत दिए थे कि ISRO धीरे-धीरे लॉन्च व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग से पीछे हट सकता है। हालांकि, यह निजीकरण नहीं, बल्कि एक रणनीतिक बदलाव है। ISRO अब डिजाइन, डेवलपमेंट और एडवांस रिसर्च पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा, जबकि रॉकेट असेंबली जैसे काम प्राइवेट इंडस्ट्री पार्टनर्स को सौंपे जाएंगे।
प्राइवेट सेक्टर के लिए बड़ा मौका
यह बदलाव डिफेंस और एयरोस्पेस कंपनियों के लिए गेम-चेंजर है। सितंबर 2025 में ISRO ने स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) तकनीक को Hindustan Aeronautics Limited (HAL) को ₹511 करोड़ के सौदे में ट्रांसफर किया था। इसमें 2 साल की ट्रेनिंग शामिल है ताकि मैन्युफैक्चरर जटिल तकनीकी बारीकियों को समझ सके। इसी तरह, HAL और Larsen & Toubro का कंसोर्टियम अब पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) के प्रोडक्शन पर काम कर रहा है।
निवेशक क्यों रखें नजर?
भारत का लक्ष्य 2033 तक स्पेस इकोनॉमी को $44 अरब तक ले जाना है। लेकिन इस ट्रांजिशन में कुछ ऑपरेशनल रिस्क भी हैं। जटिल तकनीक को ट्रांसफर करने में लगने वाला समय और ट्रेनिंग की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण है। यदि हैंडओवर या प्रोडक्शन लाइन में देरी होती है, तो लॉन्च शेड्यूल प्रभावित हो सकता है। पहला इंडस्ट्री-निर्मित PSLV लॉन्च मार्च 2027 के लिए लक्षित है, निवेशकों के लिए इस समयसीमा पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
