अपनी 94वीं वर्षगांठ पर Indian Air Force (IAF) ने भविष्य की रणनीति का ऐलान किया है, जिसमें AI, ऑटोनॉमस सिस्टम और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी पर मुख्य जोर दिया गया है। यह रोडमैप न केवल स्क्वाड्रन की कमी को पूरा करेगा, बल्कि घरेलू एयरोस्पेस कंपनियों के लिए भी लंबी अवधि के अवसर पैदा करेगा।
स्क्वाड्रन की कमी और स्वदेशी हथियारों पर जोर
IAF के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती अपनी स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को बढ़ाना है। वर्तमान में वायुसेना के पास 29 स्क्वाड्रन हैं, जो स्वीकृत 42 की संख्या से काफी कम है। इस खाई को भरने के लिए IAF अब पूरी तरह से स्वदेशी उत्पादन पर निर्भर है। इसमें LCA Mk-1A, Mk-2, और Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) जैसे प्लेटफॉर्म मुख्य भूमिका निभाएंगे। निवेशकों के लिए यह एक स्पष्ट और लंबे समय तक चलने वाला ऑडर पाइपलाइन का संकेत है।
घरेलू कंपनियों के लिए बढ़ते मौके
'आत्मनिर्भर भारत' की तर्ज पर अब तक 76,000 से ज्यादा पुर्जों का लोकलाइजेशन किया जा चुका है। इसका फायदा प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर, Mahindra Group ने Embraer के साथ मिलकर 60 विमानों वाले Multi-Role Transport Aircraft (MTA) टेंडर के लिए हाथ मिलाया है। वहीं, Apollo Micro Systems जैसी कंपनियों को भी IPREK प्रोग्राम के लिए ऑर्डर मिले हैं, जो डिफेंस में बढ़ते निजी निवेश को दर्शाता है।
रिस्क फैक्टर और चुनौतियां
भले ही सेक्टर में ग्रोथ दिख रही है, लेकिन निवेशकों को 'एग्जीक्यूशन रिस्क' पर नजर रखनी चाहिए। अतीत में LCA Mk-1A जैसे प्लेटफॉर्म्स की डिलीवरी में हुई देरी ने क्षमता को प्रभावित किया है। साथ ही, पुरानी प्रोजेक्ट्स के काम और नई हाई-टेक ऑर्डर्स के बीच बैलेंस बनाना कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए अब यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा कर पाती हैं या नहीं, क्योंकि इसी पर उनकी भविष्य की कमाई निर्भर करेगी।
