GE Aerospace ने भारत में अपनी सप्लाई चेन पर सालाना खर्च को 2030 तक मौजूदा $200 मिलियन से बढ़ाकर $400 मिलियन करने की योजना बनाई है। यह कदम भारतीय एयरलाइंस के पास मौजूद 1,700 से अधिक विमानों के ऑर्डर को पूरा करने के लिए उठाया गया है, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए नए अवसर खुलेंगे।
GE Aerospace ने भारत में अपने ऑपरेशन्स के विस्तार की बड़ी रणनीति का ऐलान किया है। कंपनी ने लक्ष्य रखा है कि वह 2030 तक अपने एनुअल सप्लाई चेन एक्सपेंडिचर को $400 मिलियन तक ले जाएगी, जो कि 2025 में $200 मिलियन है। यह निवेश भारतीय एविएशन मार्केट में इंजन ऑर्डर्स के भारी वॉल्यूम को संभालने के लिए कंपनी के घरेलू सोर्सिंग को और गहरा करने के प्रयासों को दर्शाता है।
घरेलू सप्लाई चेन पर क्या होगा असर?
GE Aerospace साउथ एशिया के सीईओ विक्रम राय ने इस फैसले की जानकारी दी है। वर्तमान में, कंपनी भारत में 17 ग्लोबल-टियर सप्लायर्स के साथ मिलकर काम कर रही है, जिसमें Tata Group, Mahindra, Hindustan Aeronautics Ltd (HAL) और Godrej जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इसके अलावा, GE का 2,000 से अधिक स्थानीय सप्लायर्स का एक मजबूत नेटवर्क भी है। यह नई रणनीति भारतीय कंपनियों के लिए ऑर्डर फ्लो बढ़ने के बेहतरीन मौके साबित हो सकती है।
प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब
इस ग्रोथ के केंद्र में कंपनी की स्थानीय सुविधाएं हैं। पुणे मैन्युफैक्चरिंग प्लांट ग्लोबल इंजन कंपोनेंट प्रोडक्शन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है, जबकि बेंगलुरु टेक्नोलॉजी सेंटर में AI-ड्रिवन सप्लाई चेन एनालिटिक्स पर काम किया जा रहा है। ये सभी यूनिट्स पूरे क्षेत्र में सर्विस में मौजूद 3,200 से अधिक इंजनों की देखरेख में मदद कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए राय और रिस्क
भारतीय इक्विटी निवेशकों के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा असर लिस्टेड घरेलू सप्लायर्स पर पड़ेगा। हालांकि, निवेशकों को कुछ रिस्क भी ध्यान में रखने चाहिए। एयरोस्पेस सप्लाई चेन में ग्लोबल स्तर पर दबाव है और प्रोडक्शन बॉटलनेक (bottlenecks) एक सामान्य समस्या है। तकनीकी मैन्युफैक्चरिंग को स्केल करने में टैलेंट मैनेजमेंट और क्वालिटी कंट्रोल जैसी चुनौतियां भी शामिल हैं। किसी भी तरह की देरी सप्लायर्स के मार्जिन पर दबाव डाल सकती है।
