लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बाद अब डिफेंस स्टॉक्स में मुनाफावसूली का दौर शुरू हो गया है। FPIs की बिकवाली और ऊंचे वैल्युएशन के चलते शेयरों में गिरावट देखी जा रही है, हालांकि **₹7.85 लाख करोड़** के डिफेंस बजट के साथ लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की कहानी अभी भी बरकरार है।
मुनाफे में कटौती का दबाव
डिफेंस सेक्टर के शेयरों ने पिछले कुछ सालों में निवेशकों को मालामाल किया है, लेकिन अक्टूबर 2026 तक आते-आते इस सेक्टर में 'कूलिंग-ऑफ' पीरियड शुरू हो गया है। हालिया गिरावट की मुख्य वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) और संस्थागत निवेशकों द्वारा की जा रही भारी मुनाफावसूली है। बाजार अब उस दौर से गुजर रहा है जहां निवेशक अपनी पुरानी पोजीशंस को दोबारा तौल रहे हैं।
क्यों घटे दाम?
शेयरों के दाम बहुत तेजी से बढ़े थे, जो अब कंपनी के वास्तविक प्रदर्शन के मुकाबले काफी महंगे लगने लगे थे। जब किसी शेयर की कीमत उसके काम से ज्यादा दौड़ने लगती है, तो छोटे-मोटे झटके भी बड़े सेल-ऑफ की वजह बन जाते हैं। कई बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में देरी होने से उन निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा, जिन्होंने इन स्टॉक्स को उनके शिखर (peak) पर खरीदा था।
लंबी अवधि की ग्रोथ और ऑर्डर की चुनौती
डिफेंस सेक्टर के लिए सरकारी नीतियां, खास तौर पर 'आत्मनिर्भर भारत' और FY27 के लिए आवंटित ₹7.85 लाख करोड़ का बजट, एक मजबूत आधार है। लेकिन चुनौती 'लम्पी ऑर्डर' (lumpy orders) को लेकर है। डिफेंस एक ऐसा बिजनेस है जहां ऑर्डर मिलने से लेकर मुनाफा कमाने तक लंबा समय लगता है। जब प्रोजेक्ट्स पूरे होने में देरी होती है, तो इसका सीधा असर कंपनी के कैश फ्लो पर पड़ता है, जिससे निवेशक घबरा जाते हैं।
अब 'इकोसिस्टम' पर दांव
जोखिम को कम करने के लिए अब निवेशक एक ही कंपनी पर बड़ा दांव लगाने के बजाय 'इकोसिस्टम' अप्रोच अपना रहे हैं। इसमें नेवल (Naval), एयरोस्पेस और ग्राउंड-सिस्टम वाली अलग-अलग कंपनियों के बास्केट में निवेश किया जा रहा है। इससे एक कंपनी के ऑर्डर में देरी होने पर भी पोर्टफोलियो का संतुलन बना रहता है।
निवेशकों को अब केवल नए ऑर्डर्स की घोषणाओं को नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि कंपनियां कितनी जल्दी उन ऑर्डर्स को सेल में बदल पा रही हैं। आने वाली कुछ तिमाहियां यह तय करेंगी कि कौन सी कंपनियां अपने ऑर्डर बुक और असली मुनाफे के बीच का फासला कम करने में कामयाब हो रही हैं।
