DRDO ने लद्दाख में **16,000 फीट** की ऊंचाई पर अपने एडवांस्ड हाई-एल्टीट्यूड पैराशूट (AHAP) सिस्टम का सफल परीक्षण किया है। यह स्वदेशी तकनीक भारतीय सेना की दुर्गम इलाकों में तैनाती की क्षमता को और मजबूत करेगी।
परीक्षण की बारीकियां
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने 6 अक्टूबर, 2026 को लद्दाख के न्योमा ड्रॉप ज़ोन में इस ऐतिहासिक ट्रायल को अंजाम दिया। पैराशूट को 16,000 फीट की ऊंचाई से छोड़ा गया, जिसने 15,500 फीट पर सफलतापूर्वक काम करना शुरू किया और अंततः 13,700 फीट की ऊंचाई पर सुरक्षित लैंडिंग की।
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
यह 'स्टैटिक-लाइन' डिप्लॉयमेंट तकनीक पर आधारित है, जहां पैराशूट विमान से जुड़ा होता है। यह तकनीक भारतीय सेना के लिए बेहद अहम है क्योंकि इससे एक साथ भारी संख्या में सैनिकों को एक निश्चित स्थान पर उतारा जा सकता है। इसे आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADRDE) ने विकसित किया है और कानपुर की ऑर्डनेंस पैराशूट फैक्ट्री ने इसे तैयार किया है। यह सिस्टम 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर काम करने में सक्षम है।
डिफेंस सेक्टर और आत्मनिर्भरता
यह कदम भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान का एक बड़ा हिस्सा है। अब तक, अत्यधिक ऊंचाई और कम हवा के घनत्व के कारण भारतीय सेना को विदेशी उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब घरेलू तकनीक से सप्लाई चेन सुरक्षित होगी और विदेशी आयात पर होने वाला खर्च कम होगा।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि परीक्षण सफल रहा है, लेकिन उच्च ऊंचाई पर परिचालन जोखिम भरा होता है। कम वायुमंडलीय दबाव के कारण उपकरण और पैराट्रूपर्स पर काफी दबाव पड़ता है। डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर के निवेशक अब यह देख रहे हैं कि कब यह तकनीक बड़े पैमाने पर सेना में शामिल की जाएगी, क्योंकि यही भविष्य के सरकारी प्रोक्योरमेंट और मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का पैमाना तय करेगी।
