DRDO के पूर्व वैज्ञानिक ने भारत की स्पेस-आधारित निगरानी प्रणाली में बड़ी खामियों को उजागर किया है। विदेशी डेटा पर निर्भरता से सुरक्षा को लेकर उठे सवालों के बीच, यह सरकार के 'स्वदेशी' तकनीक पर जोर देने के संकल्प को और मजबूत करता है, जो डिफेंस सेक्टर के निवेशकों के लिए बड़े अवसर लेकर आ सकता है।
सुरक्षा का सवाल और 'डिजिटल संप्रभुता'
DRDO के पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर एमएसवाई शिवा प्रसाद ने 'ऑपरेशन सिंदूर' का उदाहरण देते हुए देश की स्पेस सर्विलांस क्षमताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि हमारे पास सैटेलाइट का नेटवर्क तो है, लेकिन उनकी 'रीविजिट टाइम' (Revisit Time) यानी एक ही जगह से दोबारा गुजरने की फ्रीक्वेंसी में काफी अंतर है। अभी यह गैप 6 से 8 घंटे का है, जो युद्ध जैसी स्थितियों में किसी भी गतिविधि को पकड़ने के लिए काफी लंबा है।
डिफेंस सेक्टर में निवेशकों के लिए संकेत
यह तकनीकी चिंता अब एक बड़ा मार्केट ट्रिगर बन रही है। चूंकि भारत विदेशी सैटेलाइट डेटा पर निर्भरता कम करने के मूड में है, इसलिए अब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और इंडीजीनस (स्वदेशी) रिसर्च पर सरकार का खर्च बढ़ना तय है। यह उन कंपनियों के लिए बड़े मौके हैं जो 'Atmanirbhar Bharat' मिशन का हिस्सा हैं।
निवेश के मौके और चुनौतियां
सरकार अब IDEX (Innovations for Defence Excellence) जैसे प्रोग्राम्स के जरिए प्राइवेट सेक्टर को डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, सैटेलाइट ग्राउंड सिस्टम और स्पेस टेक्नोलॉजी में आगे ला रही है। जो कंपनियां हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग और डेटा प्रोसेसिंग जैसे एडवांस्ड सॉल्यूशंस पर काम कर रही हैं, उन पर निवेशकों की नजर रहनी चाहिए।
हालांकि, डिफेंस सेक्टर में निवेश के साथ कुछ रिस्क भी जुड़े हैं। इन प्रोजेक्ट्स में लंबा समय लगता है और रेगुलेटरी मानक काफी कड़े होते हैं। निवेशकों को यह समझना चाहिए कि इस सेक्टर का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि कंपनियां सरकारी ऑर्डर्स को कितनी तेजी से और कितनी सटीक तकनीक के साथ पूरा कर पाती हैं।
