रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने भारतीय वायु सेना की निगरानी क्षमता को बढ़ाने के लिए 6 एडवांस्ड स्पाय एयरक्राफ्ट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। ये विमान Airbus A321 जेट्स का इस्तेमाल करके बनाए जाएंगे और इन्हें **2032-33** तक चालू करने का लक्ष्य है। इस प्रोजेक्ट में AI Engineering Services Limited (AIESL) और Adani Defence Systems and Technologies (ADSTL) की अहम भूमिका होगी।
Detailed Coverage
मेक इन इंडिया को बड़ा बूस्ट!
DRDO ने भारतीय वायु सेना के लिए 6 नए एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) MKII एयरक्राफ्ट बनाने की पहल की है। यह प्रोग्राम Airbus A321 कमर्शियल जेट्स को हाई-टेक मिशन प्लेटफॉर्म में बदलने पर केंद्रित है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य भारत की हवाई सुरक्षा को और मजबूत बनाना है, जिसमें बेहतर निगरानी और एडवांस्ड डिटेक्शन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा।
प्राइवेट कंपनियों की अहम भूमिका
इस प्रोजेक्ट में सेंटर फॉर एयर बोर्न सिस्टम्स (CABS), जो DRDO की एक विंग है, ने प्रमुख औद्योगिक सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने का फैसला किया है। AI Engineering Services Limited (AIESL) को A321 एयरफ्रेम्स के स्ट्रक्चरल कन्वर्जन का जिम्मा सौंपा गया है। इसमें लंबे मिशन के लिए फ्यूजलाज में अतिरिक्त फ्यूल टैंक लगाना भी शामिल है। वहीं, Adani Defence Systems and Technologies (ADSTL) को डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर बनाया गया है। डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में प्राइवेट कंपनियों की यह भागीदारी सरकार की 'आत्मनिर्भर भारत' पहल को और मजबूत करती है।
नई टेक्नोलॉजी से लैस होंगे विमान
AEW&C MKII वेरिएंट में एक बड़ा टेक्नोलॉजिकल अपग्रेड देखा जाएगा। इसमें 240-डिग्री प्राइमरी डॉर्सल एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार होगा, जो नाक पर लगे एंटीना के साथ मिलकर 300-डिग्री कवरेज देगा। ये यूनिट्स गैलियम नाइट्राइड (GaN) सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करेंगी। यह टेक्नोलॉजी एनर्जी एफिशिएंसी और थर्मल मैनेजमेंट को बेहतर बनाएगी, साथ ही क्रूज मिसाइल, ड्रोन और स्टील्थ एयरक्राफ्ट जैसे छुपे हुए लक्ष्यों का पता लगाने की रेंज को बढ़ाएगी। ये प्लेन सीधे इंडियन एयर फोर्स के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जुड़ेंगे, जिससे राष्ट्रीय एयर डिफेंस नेटवर्क पर रियल-टाइम और सुरक्षित डेटा शेयरिंग संभव हो सकेगी।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों और इंडस्ट्री पर नजर रखने वालों के लिए, इस बड़े प्रोजेक्ट की एग्जीक्यूशन टाइमलाइन पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा। इस तरह के डिफेंस प्रोजेक्ट्स में सप्लाई चेन इंटीग्रेशन, सॉफ्टवेयर सर्टिफिकेशन और स्ट्रक्चरल टेस्टिंग जैसी चुनौतियां अक्सर आती हैं। 2032-33 तक इन विमानों के चालू होने की लंबी समय-सीमा को देखते हुए, AIESL में कन्वर्जन प्रोसेस और प्रोजेक्ट पार्टनर्स द्वारा मिशन सिस्टम इंटीग्रेशन की प्रगति पर नज़र रखना, प्रोजेक्ट के बजट और समय-सीमा के पालन का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा। यह पहल विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता देने की सेक्टर की लंबी अवधि की प्रवृत्ति को भी रेखांकित करती है।
