सस्ते ड्रोन से बढ़ता खतरा और भारत की नई रणनीति
आधुनिक युद्ध की अर्थव्यवस्था को समझने की ज़रूरत है, और सस्ते, प्रभावी ड्रोन स्वार्म्स (drone swarms) पारंपरिक सैन्य खर्चों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं। आनंद महिंद्रा का यह आह्वान इस बात का संकेत है कि वैश्विक संघर्षों का तरीका बदल रहा है। हकीकत यह है कि सस्ते 'कामिकेज़ ड्रोन' (kamikaze drones) अपनी लागत से कहीं ज़्यादा महंगे सैन्य साजो-सामान को बेकार कर सकते हैं। यह असंतुलन हमलावरों को कम लागत वाले तरीकों से दुश्मन के संसाधनों को थकाने का मौका देता है। यही वजह है कि भारत को सिर्फ विदेशी हथियार खरीदने की बजाय, अपनी खुद की उन्नत रक्षा प्रणालियाँ विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स (DEW) इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिनके 2035 तक 30-40 बिलियन डॉलर का बाज़ार बनने की उम्मीद है।
भारत का डीप-टेक लक्ष्य और iCreate की भूमिका
भारत के डिफेंस टेक सेक्टर ने अच्छी तरक्की की है। फाइनेंशियल ईयर 2025 में 247 मिलियन डॉलर का रिकॉर्ड फंड मिला, जिससे कुल इक्विटी निवेश 711 मिलियन डॉलर तक पहुँच गया। यह 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर रहा है, जहाँ निजी क्षेत्र का योगदान अब रक्षा उत्पादन का 27% है। गुजरात और केंद्र सरकार द्वारा समर्थित, डीप-टेक इनक्यूबेटर iCreate इस दिशा में अहम भूमिका निभा रहा है। iCreate ने 900 से अधिक नवाचारों का समर्थन किया है और डिफेंस व एयरोस्पेस स्टार्टअप्स को इनक्यूबेशन, मेंटरशिप और फंडिंग प्रदान करता है। ड्रोन चैलेंज़ जैसी पहलों के ज़रिए iCreate डीप-टेक हार्डवेयर पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो आधुनिक एयर डिफेंस के लिए ज़रूरी स्वदेशी कंपोनेंट्स और एडवांस्ड सिस्टम्स के विकास में सीधे तौर पर मदद करता है।
भारत का रणनीतिक बदलाव और वैश्विक स्तर
AI-एनेबल्ड HPM और लेज़र सिस्टम का विकास भारत के रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है, जो तकनीकी स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है। भारत ने अपने लेज़र-आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स (DEW) का सफल परीक्षण किया है, जिसने वैश्विक ध्यान खींचा है। हालांकि, युद्ध में उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन अभी जारी है। इस तरह की एडवांस्ड DEW क्षमताएं रखने वाले देशों में भारत अब अमेरिका, रूस और चीन जैसे विशिष्ट देशों के समूह में शामिल हो गया है। वैश्विक DEW बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसका कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 11.4% से 17.6% के बीच है। यह वृद्धि आधुनिकीकरण और काउंटर-ड्रोन प्रयासों से प्रेरित है। अपनी प्रगति के बावजूद, भारत का रक्षा R&D खर्च, बजट का लगभग 1.2%, वैश्विक औसत 3.4% से पीछे है। पाकिस्तान की तुलना में भारत का रक्षा भंडार बड़ा है, लेकिन यह अभी भी चीन की सैन्य क्षमताओं से पीछे है।
रक्षा खरीद की चुनौतियाँ
रक्षा खरीद प्रक्रिया (DAP 2020) जैसे नीतिगत सुधारों के बावजूद, जो खरीद में तेज़ी लाने और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हैं, भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया अभी भी लंबी समय-सीमाओं और नौकरशाही के कारण धीमी है। अनुबंधों को पूरा होने में ऐतिहासिक रूप से सात से दस साल लग जाते हैं, जो तेज़ तकनीकी बदलावों और प्रतिद्वंद्वियों द्वारा सैन्य आधुनिकीकरण की रफ़्तार के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता। तकनीक हस्तांतरण, जो आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण है, को लागू करने में भी चुनौतियाँ आई हैं। HPM और लेज़र सिस्टम्स को अनुसंधान से व्यापक उपयोग में लाने के लिए, भारत को कमज़ोर संस्थागत समर्थन और शिक्षा जगत, उद्योग व स्टार्टअप्स के बीच खराब सहयोग जैसी चुनौतियों से पार पाना होगा। स्वदेशी सिस्टम्स को बड़ा करना और उन्हें एडवांस्ड खतरों के खिलाफ रक्षा योजनाओं में एकीकृत करना एक बड़ी ऑपरेशनल और लॉजिस्टिकल बाधा बनी हुई है।
आगे का रास्ता
iCreate जैसी पहलों और खरीद सुधारों की मदद से स्थानीय विकास पर ध्यान केंद्रित करना, भारत की मज़बूत घरेलू रक्षा क्षमताओं के निर्माण के स्पष्ट इरादे को दर्शाता है। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स के बढ़ते वैश्विक बाज़ार और युद्ध में AI व ड्रोन के प्रभाव से नवाचार के अवसर पैदा हो रहे हैं। अगर भारत खरीद की समस्याओं को दूर कर डीप-टेक R&D में निवेश बनाए रखता है, तो यह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को काफी बढ़ा सकता है और भविष्य की रक्षा तकनीक में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है। आने वाले कुछ साल ही बताएँगे कि क्या ये लक्ष्य युद्ध के लिए तैयार सिस्टम्स को जन्म दे पाएंगे जो प्रभावी ढंग से और किफायती रूप से विकसित होते खतरों का मुकाबला कर सकें।