समूह की दुविधा
प्रमुख भारतीय टेक फर्मों के महत्वाकांक्षी संस्थापक एक कड़वा सबक सीख रहे हैं: विशाल इंटरनेट समूह अक्सर लाभप्रदता पर बोझ होते हैं। पेटीएम, ओला और फर्स्टक्राई जैसी कंपनियां, जिनके लीडर कई अलग-अलग विचारों को संभाल रहे हैं, अपने विशाल साम्राज्य बनाने के प्रयास में विफल रही हैं। इस रणनीति ने टिकाऊ मूल्य बनाने में काफी हद तक असफलता दिखाई है।
अनसुने सबक
अर्थशास्त्री माइकल पोर्टर ने 1980 और 90 के दशक में बताया था कि समूह संरचनाएं लाभप्रदता में बाधा डालती हैं। ऐतिहासिक रूप से, बजाज और बिड़ला जैसे भारतीय व्यापारिक परिवारों ने दशकों में इन मॉडलों से सफलतापूर्वक दूरी बना ली थी। फिर भी, संस्थापकों की नई पीढ़ी उन्हीं गलतियों को दोहराती दिख रही है, जो अक्सर अपने उपक्रमों को 'समस्याग्रस्त तिकड़ी' (troublesome triplets) में फंसा देती है।
निवेशक का प्रभाव
इसकी अंतिम कीमत निवेशकों को चुकानी पड़ती है। चाहे वह निजी फंडिंग राउंड हो या सार्वजनिक बाजार, इन व्यापक रणनीतियों में फोकस और संसाधनों का बंटवारा कम रिटर्न देता है। विविध विकास के वादे के बजाय, यह कई शेयरधारकों के लिए महत्वपूर्ण नुकसान में बदल गया है, जिससे इस 'सब कुछ कीमत पर विकास' (growth-at-all-costs) दृष्टिकोण की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।