NCLT मुंबई ने PBA Infrastructure के खिलाफ Canara Bank की याचिका को स्वीकार कर लिया है। अब कंपनी कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) के दायरे में आ गई है, जिससे मौजूदा मैनेजमेंट के हाथ से कंट्रोल निकल गया है।
क्या बदला है?
NCLT की मुंबई बेंच ने 29 सितंबर, 2026 को दिए आदेश में इस प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी है। ट्रिब्यूनल ने विजय पीतांबर लल्ला को अंतरिम रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (IRP) नियुक्त किया है, जो अब कंपनी के कामकाज को संभालेंगे।
मोरेटोरियम का असर
दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) की धारा 14 के तहत अब कंपनी पर मोरेटोरियम लागू हो गया है। इसका मतलब है कि कंपनी पर चल रहे सभी कानूनी मामले फिलहाल रुक गए हैं, संपत्तियों के ट्रांसफर पर रोक लग गई है और लेनदार किसी तरह की जबरन वसूली नहीं कर सकते।
बैंक और कंपनी का विवाद
Canara Bank ने मार्च 2012 से चले आ रहे ₹1,126.41 करोड़ के डिफॉल्ट के आधार पर यह याचिका दायर की थी। कंपनी ने इसे 'टाइम-बार्ड' बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने बैंक के साक्ष्यों को सही माना और दलीलों को खारिज कर दिया।
निवेशकों के लिए आगे की राह
PBA Infrastructure ने स्पष्ट किया है कि वे NCLAT में इस फैसले को चुनौती देंगे। हालांकि, जब तक अपीलीय न्यायाधिकरण से कोई राहत नहीं मिलती, तब तक कंपनी पूरी तरह से CIRP की शर्तों के तहत काम करेगी। निवेशकों के लिए फिलहाल अनिश्चितता बनी हुई है क्योंकि रेजोल्यूशन प्रोसेस के दौरान शेयरहोल्डर वैल्यू घटने का रिस्क बना रहता है।
