Olympic Oil Industries के FY26 के नतीजों में कोई रेवेन्यू नहीं आया है और कंपनी ने **₹22.35 लाख** का नेट लॉस दर्ज किया है। कंपनी इस वक्त SFIO और CBI जैसी जांच एजेंसियों की रडार पर है और भारी कर्ज में डूबी हुई है।
ऑपरेशंस पूरी तरह बंद
कंपनी के हालिया फाइनेंशियल ईयर (FY26) के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। Olympic Oil Industries का रेवेन्यू इस बार शून्य रहा है। कंपनी ने ₹22.35 लाख का नेट लॉस रिपोर्ट किया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा ₹24.94 लाख था। कंपनी का कामकाज साल 2019-20 से ही पूरी तरह ठप पड़ा है, जिसके कारण नेट वर्थ पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
कर्ज का जाल और जांच का दबाव
कंपनी पर बैंकों का भारी बोझ है। Indian Overseas Bank और Oriental Bank of Commerce ने इसे 'विलफुल डिफॉल्टर' घोषित कर रखा है। कंपनी पर कुल ₹68.75 करोड़ का बकाया है, जिसे 2018 में ही नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित कर दिया गया था। साथ ही, SFIO (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस) और CBI की सक्रिय जांच कंपनी की साख पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।
गवर्नेंस में बड़ी खामियां
कंपनी के हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां न तो कोई चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) है और न ही कंपनी सेक्रेटरी। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स भी सही तरीके से गठित नहीं है। फिलहाल, बोर्ड ने निपुण वर्मा को दोबारा होल-टाइम डायरेक्टर बनाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन बिजनेस को दोबारा शुरू करने का कोई ठोस प्लान मैनेजमेंट के पास नहीं है। ऑडिटर ने भी कंपनी के भविष्य पर 'गोइंग कंसर्न' यानी अस्तित्व को लेकर चेतावनी दी है।
