Kalpataru Projects International की सब्सिडियरी Kurukshetra Expressway को झटका लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने रोहतक-बवाल प्रोजेक्ट से जुड़े आर्बिट्रेशन अवार्ड के 'टर्मिनेशन पेमेंट' और उस पर लगे इंटरेस्ट वाले हिस्से को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है।
क्या हुआ?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 28 जुलाई 2026 को दिए एक फैसले में Kalpataru Projects International Ltd (KPIL) की सब्सिडियरी Kurukshetra Expressway Private Limited (KEPL) के पक्ष में आए आर्बिट्रेशन अवार्ड के एक हिस्से को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है। यह अवार्ड नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के खिलाफ रोहतक-बवाल सेक्शन ऑफ NH-71 प्रोजेक्ट को लेकर था।
कोर्ट ने अवार्ड के बाकी क्लेम्स को तो बरकरार रखा है, लेकिन 'टर्मिनेशन पेमेंट' और उस पर मिलने वाले इंटरेस्ट को नल एंड वॉइड (रद्द) कर दिया है।
क्यों है यह अहम?
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इससे रोहतक-बवाल रोड प्रोजेक्ट के खत्म होने के बाद होने वाली फाइनेंशियल रिकवरी पर असर पड़ेगा। 'टर्मिनेशन पेमेंट' आर्बिट्रेशन अवार्ड का एक अहम हिस्सा था। इस क्लेम का फाइनल नतीजा सीधे तौर पर KEPL की एसेट रिकवरी पर असर डालेगा।
पूरा मामला क्या था?
KEPL ने साल 2021 में रोहतक-बवाल रोड प्रोजेक्ट को टर्मिनेट कर दिया था। इसका मुख्य कारण किसान आंदोलन के चलते लगातार हो रहे व्यवधान और ब्लॉकैड थे, जिन्हें कंसेशन एग्रीमेंट के तहत 'फोर्स मेज्योर' इवेंट माना गया था। प्रोजेक्ट के टर्मिनेट होने के बाद, इस प्रोजेक्ट का अकाउंट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में क्लासिफाई हो गया था।
कंपनी का पक्ष
KPIL मैनेजमेंट का कहना है कि कानूनी सलाह के अनुसार, KEPL का केस मजबूत है। कंपनी इस मामले में कानूनी रास्ता अपना रही है और हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील करने का इरादा रखती है।
अब आगे क्या?
कंपनी अब 'टर्मिनेशन पेमेंट' और उससे जुड़े इंटरेस्ट को लेकर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए अपनी अपील प्रक्रिया पर फोकस करेगी। जब तक अपील का नतीजा नहीं आ जाता, तब तक इन स्पेसिफिक अमाउंट्स की रिकवरी अनिश्चित बनी रहेगी।
जोखिम क्या हैं?
इस मामले में सबसे बड़ा जोखिम अपील का नतीजा है। अगर अपील में भी फैसला कंपनी के खिलाफ जाता है, तो टर्मिनेटेड प्रोजेक्ट से उम्मीद की जा रही फाइनेंशियल रिकवरी में भारी कमी आ सकती है।
कब क्या हुआ?
प्रोजेक्ट को 2021 में टर्मिनेट किया गया था। आर्बिट्रेशन अवार्ड हाई कोर्ट के 28 जुलाई 2026 के फैसले से पहले मिला था, जिसने इसे आंशिक रूप से रद्द कर दिया है।
