सुप्रीम कोर्ट ने 2015 से पहले दिए गए माइनिंग लीज (mining lease) के आवंटन को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। इस फैसले से Deccan Gold Mines को बड़ी कानूनी राहत मिली है, हालांकि 'गनाचूर प्रोजेक्ट' (Ganajur project) के लिए अभी भी ऑपरेशनल क्लीयरेंस (operational clearances) की ज़रूरत होगी।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
9 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2015 से पहले जारी किए गए माइनिंग लीज (mining lease) के आवंटन को लेकर उठे विवाद पर अपना रुख साफ कर दिया है। कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें इन लीज को नीलामी प्रक्रिया के तहत लाने की मांग की गई थी।
'वेस्टेड राइट्स' को मिली मान्यता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2015 से पहले जिन माइनिंग लीज पर फैसले लिए जा चुके थे और मंजूरी मिल चुकी थी, उन पर 'वेस्टेड एंड एक्रूड राइट्स' (vested and accrued rights) यानी आवेदक के निहित और उपार्जित अधिकार लागू रहेंगे। ऐसे लीज 2015 के बाद की नीलामी नियमों या 2021 में लागू हुए लैप्स प्रोविजन्स (lapse provisions) के अधीन नहीं होंगे।
Deccan Gold Mines के लिए क्यों अहम?
यह फैसला Deccan Gold Mines लिमिटेड के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर उनके 'गनाचूर प्रोजेक्ट' (Ganajur project) के संबंध में। इस फैसले से कंपनी के माइनिंग लीज आवेदनों को लेकर चल रही कानूनी अनिश्चितता खत्म हो गई है, जो 2015 के कानूनी बदलावों से पहले शुरू हुए थे। यह फैसला उन कंपनियों के अधिकारों को मजबूती देता है जिनके लीज आवेदन पुराने नियमों के तहत थे।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद Deccan Gold Mines की स्थिति मजबूत हुई है। कंपनी की कानूनी टीम अब इस फैसले के 'गनाचूर प्रोजेक्ट' से जुड़े चल रहे मामलों पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रही है।
जोखिम अभी भी बाकी
हालांकि, कानूनी मोर्चे पर राहत मिलने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी माइनिंग ऑपरेशन को शुरू करने से पहले सभी ज़रूरी वैधानिक मंजूरी (statutory approvals) प्राप्त करना अनिवार्य होगा। इनमें माइनिंग प्लान, एनवायरनमेंट क्लीयरेंस (environmental clearances) और फॉरेस्ट क्लीयरेंस (forest clearances) शामिल हैं। इन ऑपरेशनल परमिट्स (operational permits) को हासिल करना अभी भी एक महत्वपूर्ण अगला कदम है और इसमें देरी की संभावना बनी हुई है।
