SBC Exports ने FY26 में दर्ज की दमदार ग्रोथ
SBC Exports लिमिटेड ने 31 मार्च, 2026 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के लिए अपने नतीजे जारी कर दिए हैं, जो रेवेन्यू और प्रॉफिट दोनों में जबरदस्त सालाना ग्रोथ दिखाते हैं। कंपनी का स्टैंडअलोन रेवेन्यू ₹301.42 करोड़ रहा, जो पिछले साल की तुलना में 30.19% अधिक है। वहीं, स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 80.46% की छलांग लगाकर ₹21.76 करोड़ पर पहुंच गया।
कंसॉलिडेटेड (Consolidated) नतीजों में भी कंपनी का प्रदर्शन मजबूत रहा। कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू 34.38% बढ़कर ₹403.21 करोड़ हुआ, जबकि नेट प्रॉफिट 89.04% की बढ़ोतरी के साथ ₹25.27 करोड़ दर्ज किया गया।
क्यों है यह खबर अहम?
कंपनी के ये मजबूत वित्तीय नतीजे लगातार बिजनेस ग्रोथ और बेहतर ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) का संकेत देते हैं। खास बात यह है कि प्रॉफिट में हुई ग्रोथ रेवेन्यू ग्रोथ से कहीं ज्यादा है, जो लागत प्रबंधन (Cost Management) या बेहतर मार्जिन की ओर इशारा करता है। प्रमोटर्स को प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट (Preferential Allotment) के जरिए शेयर जारी कर अनसिक्योर्ड लोन (Unsecured Loan) को इक्विटी (Equity) में बदलना कंपनी की बैलेंस शीट को मजबूत करता है और प्रमोटर्स का भरोसा भी दिखाता है।
पिछले साल क्या था?
पिछले वित्तीय वर्ष, FY25 में, SBC Exports का स्टैंडअलोन रेवेन्यू ₹231.53 करोड़ और नेट प्रॉफिट ₹12.06 करोड़ था। वहीं, कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू ₹300.05 करोड़ और प्रॉफिट ₹13.37 करोड़ था।
अब क्या बदलेगा?
कंपनी के डायरेक्टर्स Govind Ji Gupta, Deepika Gupta और SBC Finmart Limited को ₹36 प्रति शेयर के भाव पर 2.75 करोड़ इक्विटी शेयर जारी करने की मंजूरी दी गई है। इस प्रक्रिया के तहत ₹99.06 करोड़ के अनसिक्योर्ड लोन को इक्विटी में बदला जाएगा। इसके अलावा, कंपनी अपने अधिकृत शेयर कैपिटल (Authorized Share Capital) को ₹50 करोड़ से बढ़ाकर ₹60 करोड़ करने वाली है।
जोखिम जिन पर नजर
कंपनी का मैनेजमेंट नए लेबर कोड्स (Labour Codes) के कर्मचारी लाभ देनदारियों पर संभावित प्रभाव पर नजर रखे हुए है, हालांकि फिलहाल कोई बड़ा असर दिखने की उम्मीद नहीं है। निवेशकों के लिए सामान्य आर्थिक स्थितियां (General Economic Conditions) भी निगरानी का एक अहम बिंदु बनी रहेंगी।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशक इस बात पर बारीकी से नजर रखेंगे कि SBC Exports अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी को कैसे बनाए रखती है, नए लेबर कोड्स का क्या प्रभाव पड़ता है, और आने वाले वित्तीय वर्ष में कंपनी अपनी ग्रोथ की रफ्तार कैसे कायम रखती है।
