Mysore Paper Mills अपनी मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स को लीज पर देने का फैसला कर रही है क्योंकि यह अब चलने लायक नहीं रह गई है। कंपनी ने मार्च 2026 तिमाही में ₹20.23 करोड़ का नेट लॉस दर्ज किया है। ऑडिटर ने कंपनी की भविष्य में चलते रहने की क्षमता पर सवाल उठाए हैं।
घाटे में डूबी Mysore Paper Mills, अब मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लीज पर देगी
Mysore Paper Mills के लिए बुरी खबर है। कंपनी ने मार्च 2026 को समाप्त तिमाही के लिए ₹20.23 करोड़ का भारी नेट लॉस (Net Loss) दर्ज किया है। इस दौरान कंपनी का रेवेन्यू (Revenue) सिर्फ ₹16.23 करोड़ रहा। इन लगातार घाटे और परिचालन की अक्षमता को देखते हुए, कंपनी के बोर्ड ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स को किसी तीसरे पक्ष को लीज पर देने का बड़ा फैसला लिया है।
क्यों उठाया ये कदम?
कंपनी के मैनेजमेंट का मानना है कि मौजूदा स्थिति में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का संचालन करना अब संभव नहीं है। यह कंपनी के लिए एक बड़ा स्ट्रेटेजिक शिफ्ट (Strategic Shift) है, जो बताता है कि मुख्य मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटीज़ को वर्तमान ढांचे में बनाए रखना मुश्किल हो गया है। कंपनी के नेट लॉस (Net Loss) के साथ-साथ, स्टेटुटरी ऑडिटर (Statutory Auditor) द्वारा कंपनी की 'गोइंग कंसर्न' (Going Concern) यानी भविष्य में चलते रहने की क्षमता पर संदेह जताना, गंभीर वित्तीय संकट की ओर इशारा करता है। इससे शेयरहोल्डर्स के लिए कंपनी की भविष्य की व्यवहार्यता पर अनिश्चितता बढ़ गई है।
बैकस्टोरी और आगे क्या?
कंपनी पिछले कुछ समय से परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही थी। मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को लीज पर देने का फैसला एक औपचारिक मूल्यांकन के बाद लिया गया है, जिसमें इन्हें अलाभकारी पाया गया। हालांकि, फॉरेस्ट डिविजन (Forest Division) मौजूदा मैनेजमेंट के तहत ही काम करता रहेगा। इस लीजिंग प्रक्रिया को संभालने के लिए Infrastructure Development Corporation (Karnataka) Ltd. (iDeCK) को ट्रांजेक्शन कंसल्टेंट (Transaction Consultant) नियुक्त किया गया है। अब कंपनी का फोकस सीधे मैन्युफैक्चरिंग करने के बजाय लीज एग्रीमेंट की देखरेख और फॉरेस्ट डिविजन के प्रबंधन पर रहेगा।
जोखिम और आगे क्या देखें?
इस फैसले से जुड़े मुख्य जोखिमों में एक उपयुक्त थर्ड-पार्टी लेसी (Lessee) ढूंढना, पिछली कानूनी लड़ाइयों को देखते हुए संभावित लेबर इश्यूज (Labour Issues) और ऑडिटर द्वारा उठाए गए 'गोइंग कंसर्न' वाले गंभीर मुद्दे शामिल हैं। कंपनी का लगातार घाटा भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। निवेशकों को लीजिंग प्रक्रिया की प्रगति, कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन में किसी भी नए अपडेट और ऑडिटर की चिंताओं पर भविष्य की फाइलिंग पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। लेबर संबंधी मुद्दों पर होने वाले विकास भी महत्वपूर्ण होंगे।
