McNally Bharat Engineering: ₹25.27 करोड़ का भारी घाटा, ₹30 करोड़ का बायबैक भी जरूरी

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
McNally Bharat Engineering: ₹25.27 करोड़ का भारी घाटा, ₹30 करोड़ का बायबैक भी जरूरी

McNally Bharat Engineering के लिए जून 2026 तिमाही के नतीजे निराशाजनक रहे हैं। कंपनी को **₹25.27 करोड़** का नेट लॉस हुआ है। इसके अलावा, NCLT के आदेश के चलते कंपनी को **₹30 करोड़** का इक्विटी बायबैक भी करना होगा।

क्यों हुई ₹25.27 करोड़ की हानि?

McNally Bharat Engineering ने 30 जून 2026 को समाप्त हुई तिमाही के लिए अपने नतीजे जारी किए हैं। इन नतीजों के अनुसार, कंपनी को ₹25.27 करोड़ (यानी ₹2,527.34 लाख) का कंसोलिडेटेड नेट लॉस हुआ है। वहीं, कंपनी का रेवेन्यू ₹15.05 करोड़ (यानी ₹1,505.17 लाख) रहा।

₹30 करोड़ का बायबैक और कानूनी पचड़े

नतीजों से भी बड़ी बात यह है कि कंपनी को NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) कोलकाता बेंच के 10 जून 2026 के आदेश का पालन करते हुए, अपने फाइनेंशियल क्रेडिटर्स के पास मौजूद 5% इक्विटी शेयर्स को ₹30 करोड़ (यानी ₹3,000 लाख) में बायबैक करना होगा। कंपनी ने इस आदेश को खारिज कराने की कोशिश की थी, लेकिन वह नाकाम रही।

इसके अलावा, कंपनी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के साथ भी कानूनी विवाद में उलझी हुई है। EPFO ने कंपनी पर ₹5.65 करोड़ का डैमेजेज (क्षतिपूर्ति) और ₹3.96 करोड़ का ब्याज मांगा है। फिलहाल इन मांगों पर कानूनी स्टे (रोक) लगी हुई है।

नए ऑडिटर की नियुक्ति

कंपनी के बोर्ड ने एक अहम फैसला लेते हुए M/s. Singhi & Co. को अगले 5 सालों के लिए नया स्टेट्यूटरी ऑडिटर (वैधानिक लेखा परीक्षक) नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह नियुक्ति शेयरहोल्डर्स की मंजूरी के अधीन होगी और यह M/s. V. Singhi & Associates की जगह लेंगे।

निवेशकों के लिए क्या मायने?

यह नतीजे निवेशकों के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि ये कंपनी की जारी वित्तीय चुनौतियों को दर्शाते हैं। ₹30 करोड़ का अनिवार्य बायबैक कंपनी के कैश फ्लो पर भारी पड़ सकता है। EPFO के साथ चल रहे कानूनी मामले और बैलेंस शीट पर चल रहे रिकंसीलिएशन (समायोजन) अनिश्चितता को और बढ़ा रहे हैं। नए ऑडिटर की नियुक्ति भी एक बड़ा बदलाव है, और निवेशक यह देखने को उत्सुक होंगे कि वे कंपनी के वित्तीय ब्यौरों को कैसे देखते हैं, खासकर चल रहे रिकंसीलिएशन को देखते हुए। यह ध्यान देने योग्य है कि कंपनी एक अप्रूव्ड रेजोल्यूशन प्लान के तहत काम कर रही है।

आगे क्या?

अब कंपनी को ₹30 करोड़ के बायबैक को प्राथमिकता देनी होगी। मैनेजमेंट के बेहतर प्रदर्शन और प्रॉफिटेबिलिटी (लाभप्रदता) के अनुमानों को इन तत्काल वित्तीय जिम्मेदारियों के सामने परखा जाएगा। नए ऑडिटर की नियुक्ति वित्तीय निगरानी में एक नए चरण की शुरुआत करेगी।

जोखिम:

मुख्य जोखिमों में बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय बोझ के अनिवार्य बायबैक को सफलतापूर्वक पूरा करना, EPFO विवाद का नतीजा और वित्तीय रिकंसीलिएशन का अंतिम रूप देना शामिल है, जिससे रिपोर्टेड एसेट्स (संपत्ति) और लायबिलिटी (देनदारियों) के मूल्य प्रभावित हो सकते हैं। इन्हें मैनेज करने में विफलता वित्तीय स्थिरीकरण के रास्ते में देरी कर सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.